श्रेया देवनाथ, माइलाई कार्तिकेयन, प्रवीन स्पर्श और जी. सिलंबरासन ने बेंगलुरु में आयोजित गोविंदाष्टमी संगीत श्रृंखला में शास्त्रीय रचना और विविध प्रभावों को संतुलित किया। इस चार-सदस्यीय समूह ने शास्त्रीय और प्रयोगात्मक संगीत को सहजता से मिलाया।
- वायलिन, नागस्वरम्, मृदंगम् और थाविल का अनोखा संगम
- परम्परागत कार्नाटिक रचना के साथ आधुनिक संगीत तत्वों का मिश्रण
- प्रदर्शन में राग, तान और ताल का गहरा अन्वेषण
क्वार्टेट का परिचय और कार्यक्रम की रूपरेखा
बेंगलुरु के उन्नति द्वारा आयोजित गोविंदाष्टमी संगीत श्रृंखला में एक चार-सदस्यीय कार्नाटिक क्वार्टेट ने मंच पर अपना जादू दिखाया। वायलिनवादिनी श्रेया देवनाथ, नागस्वरम् कलाकार माइलाई कार्तिकेयन, तथा पर्कशनिस्ट प्रवीन स्पर्श (मृदंगम्) और जी. सिलंबरासन (थाविल) ने शास्त्रीय रचनाओं को विविध संगीत प्रभावों के साथ बखूबी मिश्रित किया।
मंदिर शैली से शुरू हुआ संगीत समारोह
संगीत समारोह की शुरुआत थाविल की तेज़ ताल से हुई, जो एक मंदिर नगास्वरम् प्रस्तुति की याद दिलाती थी। माइलाई कार्तिकेयन ने गम्भीरा नटाई बजाते हुए मंच पर कदम रखा, उसके बाद मृदंगम् और वायलिन ने ताल में घुलमिल कर एक सुगम मलारी रचना प्रस्तुत की, जो संकीर्ण त्रिपुता ताला में थी। यह भाग मंदिर परेड की ऊर्जा को कॉन्सर्ट सेटिंग में बदल देता है।
त्यागराज और अन्य शास्त्रीय कृतियों का प्रस्तुतिकरण
त्यागराज की कृति ‘गणमुरते’ को संक्षिप्त राग प्रील्यूड के साथ प्रस्तुत किया गया, जहाँ कल्पनस्वर भाग में सरवलघु पैटर्न का कुशल उपयोग हुआ। उसी कलाकार ने ‘हेच्चरिकगरा रा रा’ को यदुकुलकम्बोजी में रूपांतरित किया, जिससे खंडा चापु ताल में लयी का सहज प्रवाह बना रहा।
राग अभिचार और विस्तार
‘बिहारि’ राग की अभिचार में श्रोताओं को एक विस्तृत ध्वनि यात्रा पर ले जाया गया। वायलिन पर शैला ने राग शुरू किया, जबकि माइलाई ने नागस्वरम् पर इसे आगे बढ़ाया, जिससे दोनों वाद्य युक्तियों में गहराई और चौड़ाई का अद्भुत संगम दिखा।
स्वरकल्पना और द्रोण कर्ण पैटर्न
‘द्रोण कर्ण’ के मध्य में स्वरकल्पना में शैला ने अपने गुरु लालगुड़ी जयरामण से सीखा हुआ पैटर्न प्रस्तुत किया। यह पैटर्न ‘री सा नि ध प म ग री’ क्रम से बना है, जिसे तीर से निकले तीरों की तरह चित्रित किया गया, जिससे महाभारत के युद्ध की भावना उभरी।
तानी अवर्तन और विविध रचनाओं का समावेश
तानी अवर्तन में ताल की तेज़ी ने कृतियों के सुगम साथ को एक तीखा विरोधाभास दिया। इसके बाद समूह ने संत तुकाराम की अभंग ‘बा रे पांडुरंगा’ (माँड राग) और रवींद्र संगीत ‘अमर मलिका बों’, जैसे विविध शैलियों को मंच पर लाया, जिससे श्रोताओं को एक बहु-आयामी संगीत अनुभव मिला।
इतिहासिक पृष्ठभूमि
कार्नाटिक संगीत दक्षिण भारतीय शास्त्रीय संगीत की एक प्रमुख शाखा है, जिसमें वायलिन, मृदंगम्, और थाविल जैसे वाद्य सामान्यतः प्रयोग होते हैं। नागस्वरम्, एक प्राचीन वुडविंड, अक्सर मंदिर समारोहों में बजाया जाता है, और इसका ध्वनि रंग थाविल की ताल के साथ मिलकर एक अद्वितीय ध्वनि बनाता है। इस क्वार्टेट ने इन परम्परागत वाद्यों को समकालीन संरचना के साथ जोड़कर एक नया संगीत मार्ग प्रशस्त किया।
Why This Matters
BozokMedia analysis shows that such cross‑genre collaborations rejuvenate classical traditions, attract younger audiences, and ensure the financial sustainability of Carnatic music institutions across India.
"जब शास्त्रीय और समकालीन संगीत एक साथ मिलते हैं, तो यह न केवल श्रोताओं को नई ध्वनि प्रदान करता है, बल्कि परम्परा को जीवित रखने का एक प्रभावी उपाय भी बन जाता है," कहा शास्त्रीय संगीत विशेषज्ञ डॉ. अनिल कुमार ने।
Frequently Asked Questions
Q1: क्या इस क्वार्टेट ने किसी विशेष थीम पर फोकस किया?
A: हाँ, उन्होंने गोविंदाष्टमी के उत्सव को ध्यान में रखकर परम्परागत और आधुनिक रचनाओं को मिश्रित किया।
Q2: इस प्रकार के सहयोग का भविष्य में क्या महत्व है?
A: यह युवा श्रोताओं को आकर्षित करता है, शास्त्रीय संगीत की पहुँच का विस्तार करता है, और कलाकारों के बीच नवाचार को प्रोत्साहित करता है।