राजीव कुमार की श्री शास़्था क्षेत्र वाद्य संगम ने चेन्नई में चेंडा वादन को मुफ्त में सिखाकर एक दशक से अधिक समय तक सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखा है। ऑनाम के आगमन से पहले यह पहल विभिन्न आयु वर्ग और लिंग के छात्रों को संगीत की ताकत से जोड़ रही है।
- चेंडा प्रशिक्षण पूरी तरह मुफ्त
- 10 वर्षों में लगभग 150 छात्रों ने महारत हासिल की
- सभी उम्र और लिंग के लिए खुला मंच
केरल के मंदिर उत्सवों की गूँजती तालें जब चेन्नई के विलिवक्कम में सुनाई देती हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि श्री शास़्था क्षेत्र वाद्य संगम ने ऑनाम के मौसम में चेंडा मेलम को जीवित रखने का काम बखूबी किया है। राजीव कुमार ने अपने पिता सी.एन. सुकुमारन गुरुस्वामी की प्रेरणा लेकर 2013 में द्वितीय कुंभाभिषेक के दौरान इस पहल की नींव रखी।
इतिहासिक पृष्ठभूमि
चेंडा, दक्षिण भारत का पारम्परिक ड्रम, प्राचीन काल से ही केरल के मंदिरों और ऑनाम उत्सवों में मुख्य भूमिका निभाता आया है। इसकी तीव्र तालें और तीखा स्वर स्थानीय संस्कृति के साथ गहरा संबंध रखता है, परन्तु चेन्नई जैसे बाहर के राज्यों में प्रशिक्षण की सुविधा सीमित थी। इस अंतर को पाटने के उद्देश्य से राजीव ने केरल के गुरु देवराज मारर के पास दो साल की गहन शिक्षा प्राप्त की।
वापस लौटने के बाद उन्होंने समझा कि केवल यात्रा करके सीखना कई इच्छुक विद्यार्थियों के लिए असम्भव है। इस कारण उन्होंने एक चैरिटेबल ट्रस्ट के रूप में संगम की स्थापना की, जहाँ शिक्षा तीन भाषाओं—तमिल, अंग्रेज़ी और मलयालम—में दी जाती है।
नए छात्रों को पहले छेम्बडा थालम सिखाया जाता है, जिसके बाद वे पन्चारी मेलम और अदंथा मेलम की ओर बढ़ते हैं। औसतन चार‑पाँच महीने में बुनियादी कौशल हासिल हो जाता है, और प्रत्येक दिसंबर में एक अरंगत्रम् (प्रदर्शनी) आयोजित किया जाता है। 2026 में दसवीं बैच की तैयारी के साथ अब तक लगभग 150 छात्र इस प्रशिक्षण से लाभान्वित हो चुके हैं।
सत्र में युवा लड़के‑लड़कियों से लेकर मध्य‑वयस्क पुरुष‑महिला तक सभी शामिल होते हैं। शंकर ए. और आर. कार्तिक कक्षा चलाते हैं, जबकि एस. सुरेन्दर आयोजन और टीम प्रबंधन संभालते हैं। शंकर का कहना है कि प्रत्येक भाग को छोटे‑छोटे चरणों में बाँटने से सीखने की गति तेज़ होती है और विद्यार्थियों की एकाग्रता बढ़ती है।
Why This Matters
BozokMedia analysis shows that preserving regional art forms like Chenda outside their native state not only safeguards cultural diversity but also creates new avenues for community bonding and tourism revenue in metropolitan areas such as Chennai.
"Chenda के माध्यम से युवा वर्ग में अनुशासन और सांस्कृतिक पहचान का विकास होता है," कहा संगीतशास्त्री डॉ. अनीता रॉय ने।
Frequently Asked Questions
Q1: क्या चेंडा सीखने के लिए कोई आयु सीमा है?
A: नहीं, संगम सभी आयु वर्ग के इच्छुक शिक्षार्थियों को स्वागत करता है।
Q2: क्या कक्षा में भाग लेने के लिए कोई पृष्ठभूमि आवश्यक है?
A: नहीं, बिल्कुल भी नहीं। शुरुआती भी बुनियादी ताल से शुरू कर सकते हैं।