फिल्म 'टॉक्सिक' ने मंच से महिलाओं की आवाज होने का वादा किया था, लेकिन कहानी के भीतर पांचों दिग्गज अभिनेत्रियां केवल नायक की यात्रा को आगे बढ़ाने के साधन बनकर रह गईं।

  • फिल्म में पांच दिग्गज अभिनेत्रियां हैं, लेकिन किसी का भी स्वतंत्र किरदार नहीं है।
  • निर्देशक गीता मोहनदास होने के बावजूद, फिल्म पूरी तरह से 'यश' केंद्रित है।
  • महिला पात्रों का उपयोग केवल नायक के विकास के लिए एक उपकरण के रूप में किया गया है।

यश की बहुप्रतीक्षित फिल्म 'टॉक्सिक' (Toxic) ने रिलीज से पहले बड़े-बड़े दावे किए थे। हैदराबाद के एक कार्यक्रम में खुद सुपरस्टार यश ने वादा किया था कि यह फिल्म महिलाओं की आवाज बनेगी और ट्रेलर में दिखाए गए 'मेल गेज' से अलग एक गहरी कहानी पेश करेगी। हालांकि, फिल्म देखने के बाद ऐसा लगता है कि यह वादा केवल मंच तक ही सीमित रह गया।

फिल्म में कियारा आडवाणी, नयनतारा, तारा सुतारिया, रुक्मिणी वसंत और हुमा कुरैशी जैसी पांच दिग्गज अभिनेत्रियां हैं। ये सभी कलाकार अपनी क्षमता में माहिर हैं, लेकिन फिल्म की पटकथा ने उन्हें वह गहराई नहीं दी जिसके वे हकदार हैं। फिल्म की कहानी में हर महिला पात्र का प्रवेश तब होता है जब नायक राया (यश) को उनकी आवश्यकता होती है, और उनका प्रस्थान तब होता है जब नायक का काम पूरा हो जाता है।

क्यों यह महत्वपूर्ण है

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि आधुनिक सिनेमा में 'महिला सशक्तिकरण' का उपयोग अक्सर केवल मार्केटिंग टूल के रूप में किया जाता है। 'टॉक्सिक' इस प्रवृत्ति का एक ज्वलंत उदाहरण है, जहाँ एक महिला निर्देशक होने के बावजूद, फिल्म का ढांचा पूरी तरह से पुरुष-प्रधान बना हुआ है।

फिल्म ने महिलाओं को सशक्त दिखाने का दिखावा तो किया, लेकिन वास्तव में उन्हें केवल नायक के भावनात्मक उतार-चढ़ाव का जरिया बना दिया।

नयनतारा द्वारा निभाया गया 'गंगा' का किरदार फिल्म का सबसे मजबूत महिला पात्र लग सकता है, लेकिन उसकी पूरी पहचान उसके भाई (यश) के इर्द-गिर्द सिमटी हुई है। उसकी कोई अपनी महत्वाकांक्षा या स्वतंत्र जीवन नहीं है; वह केवल नायक को गोवा के अंडरवर्ल्ड का राजा बनाने के लिए एक रणनीतिकार के रूप में मौजूद है।

इसी तरह, कियारा आडवाणी का किरदार 'नादिया' भी नायक की कहानी को जटिल बनाने के लिए इस्तेमाल किया गया है। उसका दर्द और उसका आघात (trauma) उसके अपने विकास के लिए नहीं, बल्कि नायक को संकट से निकालने के लिए एक प्लॉट डिवाइस के रूप में उपयोग किया गया है। तारा सुतारिया का किरदार एक 'स्टेपिंग स्टोन' की तरह है, जिसे नायक की भावनात्मक यात्रा में आगे बढ़ने के लिए छोड़ दिया जाता है।

ऐतिहासिक संदर्भ

भारतीय सिनेमा में अक्सर महिला पात्रों को 'सहायक' के रूप में दिखाया जाता रहा है। 'KGF' जैसी फिल्मों की सफलता के बाद, यश ने एक बड़े स्टार के रूप में अपनी छवि बनाई है, लेकिन 'टॉक्सिक' जैसी फिल्मों में महिला किरदारों की अनदेखी यह दर्शाती है कि बड़े बजट की फिल्मों में भी लैंगिक समानता केवल कागजों पर है।

क्या आप जानते हैं?: 'टॉक्सिक' का निर्देशन गीता मोहनदास ने किया है, जो अपनी गंभीर और कलात्मक फिल्मों के लिए जानी जाती हैं।

Frequently Asked Questions

1. क्या 'टॉक्सिक' में महिलाओं के लिए कोई स्वतंत्र कहानी है?
नहीं, फिल्म में सभी पांच महिला पात्रों की कहानियां नायक 'राया' के जीवन और उसकी जरूरतों से जुड़ी हुई हैं।

2. फिल्म की मुख्य समस्या क्या है?
मुख्य समस्या यह है कि फिल्म ने महिलाओं की आवाज होने का वादा किया था, लेकिन पटकथा में उन्हें केवल नायक के विकास के लिए एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया गया है।