अभिनेत्री शबाना आजमी ने समाज में बढ़ते धार्मिक विभाजन पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि असली संघर्ष धर्मों के बीच नहीं, बल्कि उदारवादियों और कट्टरपंथियों के बीच है। उन्होंने बताया कि कैसे उन्हें और जावेद अख्तर को दोनों समुदायों के चरमपंथियों का सामना करना पड़ता है।
- शबाना आजमी के अनुसार असली संघर्ष धर्मों के बीच नहीं, बल्कि उदारवादियों बनाम कट्टरपंथियों के बीच है।
- उन्हें और जावेद अख्तर को हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के चरमपंथियों के विरोध का सामना करना पड़ता है।
- उन्होंने फिल्म 'बटवारा 1947' की विफलता का कारण सनी देओल द्वारा मुस्लिम किरदार निभाने पर जनता की असहजता को बताया।
मशहूर अभिनेत्री शबाना आजमी ने एक बार फिर देश में बढ़ते सांप्रदायिक तनाव और धार्मिक कट्टरपंथ पर कड़ा प्रहार किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि समाज में जो दिखाई देता है, वह वास्तविकता नहीं है। उनके अनुसार, असली लड़ाई हिंदू और मुस्लिम के बीच नहीं है, बल्कि यह लड़ाई उन उदारवादियों और कट्टरपंथियों के बीच है जो समाज को बांटना चाहते हैं।
एक साक्षात्कार के दौरान, आजमी ने साझा किया कि कैसे उन्हें और उनके पति, गीतकार जावेद अख्तर को दोनों धर्मों के कट्टरपंथी तत्वों द्वारा निशाना बनाया जाता है। उन्होंने कहा, "दोनों समुदायों के चरमपंथी हमें बर्दाश्त नहीं कर सकते। कभी कोई मौलवी फतवा भेजता है, तो कभी कोई हमें आतंकवादी कहता है। इससे हमारे धर्मनिरपेक्ष होने का प्रमाण मिलता है।"
Why This Matters
BozokMedia analysis shows कि शबाना आजमी का यह बयान उस बदलते सामाजिक परिवेश को दर्शाता है जहां कला और पहचान को धार्मिक चश्मे से देखा जाने लगा है। उनका तर्क है कि उदारवादी हिंदू और मुस्लिम एक ही पक्ष में हैं, जबकि कट्टरपंथी दोनों धर्मों में एक ही विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं।
"असली लड़ाई धर्मों के बीच नहीं, बल्कि उदारवादी सोच और कट्टरपंथी मानसिकता के बीच है।"
शबाना आजमी ने भारतीय संविधान और देश की मिली-जुली संस्कृति (Composite Culture) का हवाला देते हुए कहा कि वर्तमान विभाजन भारत की आत्मा के विरुद्ध है। उन्होंने जोर दिया कि लोगों को उस गड्ढे में नहीं गिरना चाहिए जिसे जानबूझकर विभाजन पैदा करने के लिए बनाया गया है।
इसके अलावा, उन्होंने हालिया फिल्म 'बटवारा 1947' की बॉक्स ऑफिस विफलता पर भी चर्चा की। उन्होंने टिप्पणी की कि दर्शक सनी देओल को एक मुस्लिम किरदार में देखने के लिए तैयार नहीं थे। उन्होंने इसकी तुलना अमिताभ बच्चन के दौर से की, जब वे 'कूलie' जैसी फिल्मों में सहजता से विभिन्न धार्मिक भूमिकाएं निभाते थे।
Frequently Asked Questions
1. शबाना आजमी ने किस प्रकार के संघर्ष की बात की है?
उन्होंने कहा कि असली संघर्ष धर्मों के बीच नहीं, बल्कि उदारवादियों और कट्टरपंथियों के बीच है।
2. उन्होंने सनी देओल के बारे में क्या कहा?
उन्होंने कहा कि फिल्म की विफलता का एक कारण दर्शकों का सनी देओल को मुस्लिम किरदार में स्वीकार न कर पाना था।