पुरस्कार विजेता निर्देशक अनुपर्णा रॉय अपनी दूसरी फिल्म 'लवर्स इन द ब्लू नाइट' के साथ वेनिस इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में लौट रही हैं, जो मुंबई में प्रवासियों की वर्जित इच्छाओं की कहानी है।
- अनुपर्णा रॉय अपनी पहली फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार जीतने के बाद फिर से वेनिस ओरिज़ोंटी प्रतियोगिता में शामिल होंगी।
- 'लवर्स इन द ब्लू नाइट' मुंबई में रहने वाले चार प्रवासियों के जीवन, उनकी तन्हाई और छिपी हुई पहचान पर आधारित है।
- यह फिल्म रॉय की बचपन की यादों और एक घरेलू सहायिका व उसके पति के जटिल रिश्तों से प्रेरित है।
वेनिस इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल एक बार फिर भारत की एक उभरती हुई सिनेमाई प्रतिभा का स्वागत करने के लिए तैयार है। निर्देशक अनुपर्णा रॉय, जिन्होंने अपनी पहली फिल्म 'सॉन्ग्स ऑफ फॉरगॉटन ट्रीज़' के लिए ओरिज़ोंटी सेगमेंट में सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार जीतकर इतिहास रचा था, अब अपनी दूसरी फीचर फिल्म 'लवर्स इन द ब्लू नाइट' के साथ वापसी कर रही हैं। यह फिल्म शहरी जीवन के उन हाशिए के हिस्सों को छूती है जिन्हें अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है।
इस फिल्म की जड़ें पश्चिम बंगाल के पुरुलिया में रॉय के बचपन की यादों में छिपी हैं। उन्हें याद है कि कैसे वह अपनी बड़ी चाची के घर पर काम करने वाली अमीना और उसके पति करीम के रिश्तों को देखती थीं। सालों बाद उन्हें अहसास हुआ कि करीम समलैंगिक (gay) थे और उनकी शादी केवल सामाजिक स्वीकृति पाने का एक जरिया थी। इसी अहसास को अनुपर्णा ने वर्तमान मुंबई की पृष्ठभूमि में प्रवासियों की कहानी के रूप में ढाला है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि रॉय का दृष्टिकोण भारतीय स्वतंत्र सिनेमा में 'रेडिकल इंटिमेसी' (गहन आत्मीयता) की ओर एक बदलाव को दर्शाता है। प्रवासन और वर्जित इच्छाओं के मिलन बिंदु पर ध्यान केंद्रित करके, वह प्रवासी अनुभव की पारंपरिक धारणाओं को चुनौती देती हैं। वह केवल आर्थिक संघर्ष की बात नहीं करतीं, बल्कि हाशिए पर रहने वाले लोगों की मनोवैज्ञानिक और यौन पहचान की खोज करती हैं। व्यावसायिक सितारों के बजाय अपने दोस्तों को कास्ट करना उनकी प्रमाणिकता के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
रॉय का वैश्विक मंच तक का सफर काफी संघर्षपूर्ण रहा है। अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिलने से पहले, उन्होंने अपनी पहली फिल्म के लिए पैसे जुटाने के लिए दो अलग-अलग आईटी कंपनियों में चुपके से काम किया। उनकी यह जिद उनकी अटूट दृष्टि को दर्शाती है। उन्होंने स्वीकार किया है कि ऋत्विक घटक के यथार्थवाद और 'रोमा' जैसी फिल्मों ने उनकी सिनेमाई भाषा को आकार दिया, जबकि उन्होंने फिल्म निर्माण की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली है।
"फिल्म निर्माण अप्रत्याशित है; अंतिम संपादन अक्सर निर्माता को दर्शकों से ज्यादा हैरान करता है, क्योंकि कहानी सेट पर स्वाभाविक रूप से विकसित होती है।"
'लवर्स इन द ब्लू नाइट' की कहानी चार प्रवासियों के इर्द-गिर्द घूमती है: एक ऐसा पति जो अपनी पहचान छिपा रहा है, उसकी तन्हा पत्नी जो एक बार में काम करती है, एक छोटा चोर और एक दलाल। इन चारों के जीवन का मिलन उत्तरजीविता और तड़प की एक दास्तां बुनता है। रॉय की 'पर्सनल कास्टिंग' पद्धति उन्हें सेट पर संवादों और दृश्यों को बदलने की आजादी देती है, जिससे फिल्म अधिक वास्तविक लगती है।
भविष्य की योजनाओं के बारे में बात करते हुए, रॉय ने कहा कि वह मानव मन की गहराइयों को खंगालना जारी रखेंगी। उनकी अगली परियोजनाओं में एक लंबे समय से चल रहे लेकिन असफल विवाह और यौन जागृति पर आधारित एक ड्रामा शामिल है। उनका मानना है कि जब वे अपने अनुभवों को लिखती हैं, तो उसमें वह सच्चाई होती है जो दूसरों की कहानियों को लिखने में शायद संभव न हो।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न: अनुपर्णा रॉय ने अपने पहले वेनिस फिल्म फेस्टिवल में कौन सा पुरस्कार जीता था?
उत्तर: वह अपनी फिल्म 'सॉन्ग्स ऑफ फॉरगॉटन ट्रीज़' के लिए ओरिज़ोंटी सेगमेंट में सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार जीतने वाली पहली भारतीय फिल्म निर्माता बनीं।
प्रश्न: 'लवर्स इन द ब्लू नाइट' का मुख्य विषय क्या है?
उत्तर: यह फिल्म मुंबई में रहने वाले चार प्रवासियों की वर्जित इच्छाओं, अकेलेपन और अस्तित्व के संघर्ष की कहानी है।