फिल्म निर्माता तिग्मांशु धूलिया ने एक चौंकाने वाला ऐतिहासिक किस्सा साझा किया है कि कैसे सेंसर बोर्ड ने दिलीप कुमार के मुस्लिम होने के कारण उन्हें 'हे राम' कहने से रोका था, जिसे बाद में पीएम जवाहरलाल नेहरू ने सुलझाया।

  • सेंसर बोर्ड ने फिल्म 'गंगा जमना' में दिलीप कुमार द्वारा 'हे राम' कहने पर आपत्ति जताई क्योंकि वे मुस्लिम थे।
  • पीएम जवाहरलाल नेहरू ने व्यक्तिगत रूप से फिल्म देखकर इस विवाद को सुलझाया।
  • तिग्मांशु धूलिया ने ब्रिटिश काल से वर्तमान तक सेंसरशिप के विकास पर चर्चा की।
  • बलराज साहनी का 'जेल-से-सेट' तक का सफर शुरुआती भारतीय सिनेमा के अनूठे राजनीतिक माहौल को दर्शाता है।

मीडिया और फिल्म उद्योग की वर्तमान स्थिति पर एक कार्यक्रम के दौरान, प्रसिद्ध फिल्म निर्माता तिग्मांशु धूलिया ने भारतीय सिनेमा में सेंसरशिप के जटिल इतिहास पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि कैसे फिल्म निर्माताओं ने ब्रिटिश राज के दौरान सूक्ष्म विद्रोह से लेकर स्वतंत्रता के बाद की नौकरशाही बाधाओं तक, राजनीतिक प्रतिबंधों के साथ तालमेल बिठाया।

सबसे चौंकाने वाला खुलासा क्लासिक फिल्म 'गंगा जमना' को लेकर था। धूलिया ने याद किया कि कैसे सेंसर बोर्ड ने उस दृश्य पर कड़ी आपत्ति जताई जिसमें दिलीप कुमार का किरदार मरते समय 'हे राम' कहता है। फिल्म निर्माताओं के तर्क कि कुमार 'गंगा' नाम के एक हिंदू चरित्र की भूमिका निभा रहे हैं, के बावजूद बोर्ड नहीं माना। बोर्ड का तर्क था कि दिलीप कुमार वास्तविक जीवन में मुस्लिम हैं, इसलिए वे ऐसा नहीं कह सकते।

यह क्यों महत्वपूर्ण है

BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि यह घटना भारत में कलात्मक प्रतिनिधित्व और पहचान की राजनीति के बीच शुरुआती तनाव को दर्शाती है। यह तथ्य कि मामला देश के सर्वोच्च पद तक पहुंचा, 1950 के दशक में सेंसर बोर्ड के प्रभाव और सिनेमाई विमर्श की संवेदनशीलता को रेखांकित करता है।

यह गतिरोध तब टूटा जब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने हस्तक्षेप किया। फिल्म देखने के बाद, नेहरू ने संवाद की कलात्मक आवश्यकता को स्वीकार किया और इसे मंजूरी दे दी। दिलचस्प बात यह है कि दिलीप कुमार को मिलने वाले विशेष लाभ के आरोपों से बचने के लिए, सरकार ने उस समय अटके हुए अन्य सभी फिल्मों को भी क्लियर कर दिया।

शुरुआती भारत में सिनेमा और राज्य की शक्ति का मिलन कूटनीति और कलात्मक विद्रोह का एक नाजुक संतुलन था।

धूलिया ने स्वतंत्रता संग्राम के दौर का भी जिक्र किया, जिसमें 1943 की फिल्म 'किस्मत' का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि कैसे गाने 'दूर हटो ऐ दुनिया वालों' को अंग्रेजों ने जापानी सेना के खिलाफ समझा, जबकि भारतीय जनता जानती थी कि यह अंग्रेजों के खिलाफ आजादी का आह्वान था। इस 'कॉस्मोपॉलिटन संस्कृति' ने फिल्म निर्माताओं को औपनिवेशिक अधिकारियों की नजरों से बचकर देशभक्ति के संदेश देने में मदद की।

इसके अलावा, उन्होंने 'हलचल' फिल्म के दौरान बलराज साहनी की अद्भुत कहानी साझा की। आईपीटीए से जुड़े साहनी को उनके राजनीतिक विचारों के कारण गिरफ्तार कर लिया गया था। एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए, सरकार ने उन्हें हर सुबह जेल से निकलकर सेट पर जाने और जेलर की भूमिका निभाने की अनुमति दी, जिसके बाद वे शाम को वापस जेल लौट आते थे।

अपनी बात समाप्त करते हुए, धूलिया ने इन अनुभवों की तुलना 2017 की अपनी फिल्म 'राग देश' से की। आईएनए ट्रायल्स पर आधारित इस फिल्म को सेंसर बोर्ड ने काफी सराहा, लेकिन इसके बावजूद फिल्म की रिलीज में अनावश्यक देरी हुई और भुगतान में समस्या आई, जो यह दर्शाता है कि सेंसरशिप का स्वरूप बदला है, लेकिन रचनात्मक स्वतंत्रता का संघर्ष आज भी जारी है।

क्या आप जानते हैं?: 1943 की फिल्म 'किस्मत' ने एक देशभक्ति गीत का उपयोग ब्रिटिश सेंसरों को यह विश्वास दिलाने के लिए किया था कि गीत जापानी साम्राज्य के खिलाफ है, न कि ब्रिटिश राज के खिलाफ।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: सेंसर बोर्ड ने दिलीप कुमार के 'हे राम' कहने पर आपत्ति क्यों जताई?
बोर्ड का तर्क था कि चूंकि दिलीप कुमार वास्तविक जीवन में मुस्लिम थे, इसलिए उनके लिए हिंदू आह्वान का उपयोग करना अनुचित था, चाहे वे कोई भी किरदार निभा रहे हों।

प्रश्न 2: पीएम नेहरू ने 'गंगा जमना' विवाद को कैसे सुलझाया?
नेहरू ने फिल्म देखी, दृश्य को मंजूरी दी और यह सुनिश्चित करने के लिए कि दिलीप कुमार को विशेष उपचार नहीं मिला, अन्य लंबित फिल्मों को भी मंजूरी दे दी।