हाल ही में रिलीज हुई दो फिल्मों, 'बबिता सिंह रिपोर्टिंग' और 'गांधारी' ने महिला नायकत्व को पर्दे पर उतारा है। जहाँ एक फिल्म पितृसत्ता पर गहरा प्रहार करती है, वहीं दूसरी एक्शन स्टार इमेज बनाने की कोशिश में भटकती नजर आती है।

  • बबिता सिंह रिपोर्टिंग पितृसत्ता और सामाजिक दबावों का यथार्थवादी चित्रण करती है।
  • गांधारी महिला सशक्तिकरण के नाम पर एक्शन और स्टीरियोटाइप का सहारा लेती है।
  • दोनों फिल्मों में पौराणिक संदर्भों का उपयोग किया गया है, लेकिन उनके उद्देश्य अलग हैं।

भारतीय सिनेमा में पिछले कुछ वर्षों में 'वीर माता' या 'बदला लेने वाली महिला' के उप-शैली (subgenre) में काफी वृद्धि हुई है। 'कहानी' जैसी फिल्मों के बाद हमने 'आर्या' और 'मिसेज चटर्जी वर्सेस नॉर्वे' जैसी कहानियाँ देखीं, जहाँ महिलाएँ अपने परिवार के लिए व्यवस्था से लड़ती हैं। इसी कड़ी में हाल ही में नेटफ्लिक्स पर 'गांधारी' और अमेज़न प्राइम वीडियो पर 'बबिता सिंह रिपोर्टिंग' रिलीज हुई हैं।

दोनों फिल्मों की कहानी एक ऐसी महिला के इर्द-गिर्द घूमती है जिसे समाज कमजोर या कमतर आंकता है। 'गांधारी' में तापसी पन्नू एक माँ की भूमिका में हैं जो अपनी लापता बेटी की तलाश कर रही हैं, जबकि 'बबिता सिंह रिपोर्टिंग' में निमिषा सजयन एक ऐसी महिला की भूमिका में हैं जो अपने बचपन के दोस्त की रहस्यमयी मौत का सच खोजना चाहती हैं।

क्यों यह महत्वपूर्ण है

BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह तुलना केवल दो फिल्मों के बीच नहीं, बल्कि कहानी कहने के दो अलग तरीकों के बीच है। एक तरफ वह सिनेमा है जो महिला के आंतरिक संघर्ष और मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देता है, और दूसरी तरफ वह है जो केवल बाहरी दिखावे और 'एक्शन हीरो' की छवि बनाने पर केंद्रित है।

'बबिता सिंह रिपोर्टिंग' में निर्देशक अंबिका पंडित और लेखिका अमिता व्यास ने पितृसत्ता के सूक्ष्म प्रभावों को खूबसूरती से पिरोया है। फिल्म यह दिखाती है कि कैसे समाज पुरुषों को 'प्रदाता' और महिलाओं को 'पोषणकर्ता' की भूमिकाओं में बांध देता है। यहाँ बबिता एक पुलिस अधिकारी होने के बावजूद खुद को असुरक्षित महसूस करती है, जो इस कड़वे सच को उजागर करता है कि वर्दी पहनने के बाद भी एक महिला समाज में उतनी ही असुरक्षित हो सकती है।

"सच्चा सशक्तिकरण बाहरी लड़ाई जीतने में नहीं, बल्कि अपनी आत्म-मूल्य (self-worth) को पहचानकर बाहरी मान्यताओं से मुक्त होने में है।"

इसके विपरीत, 'गांधारी' में एक कृत्रिमता महसूस होती है। फिल्म ऐसा लगता है जैसे तापसी पन्नू को एक 'एक्शन स्टार' के रूप में पेश करने के लिए बनाई गई हो। बाल तस्करी जैसे गंभीर मुद्दे को कहानी में जबरदस्ती फिट किया गया लगता है, जिससे फिल्म की गहराई कम हो जाती है। यहाँ तक कि फिल्म का शीर्षक 'गांधारी' भी कहानी के साथ पूरी तरह मेल नहीं खाता, क्योंकि पौराणिक गांधारी ने पति के लिए आँखों पर पट्टी बांधी थी, जबकि इस फिल्म की नायिका का संघर्ष अलग है।

विशेषता बबिता सिंह रिपोर्टिंग गांधारी
मुख्य विषय पितृसत्ता और आत्म-सम्मान बाल तस्करी और मातृत्व
दृष्टिकोण यथार्थवादी और सूक्ष्म एक्शन-ओरिएंटेड और नाटकीय
पौराणिक संदर्भ दशहरा और रावण दहन (प्रतीकात्मक) महाभारत की गांधारी (नाममात्र)
क्या आप जानते हैं?: 'कहानी' फिल्म ने भारतीय सिनेमा में उस ट्रेंड की शुरुआत की थी जहाँ एक अकेली महिला को पूरी व्यवस्था के खिलाफ लड़ते हुए दिखाया गया, जिससे बाद में 'आर्या' जैसे किरदारों का जन्म हुआ।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. बबिता सिंह रिपोर्टिंग और गांधारी में मुख्य अंतर क्या है?
मुख्य अंतर लेखन और इरादे का है। बबिता सिंह रिपोर्टिंग सामाजिक टिप्पणी पर केंद्रित है, जबकि गांधारी नायिका को एक एक्शन हीरो के रूप में दिखाने का प्रयास करती है।

2. क्या गांधारी फिल्म पौराणिक गांधारी से प्रेरित है?
फिल्म का शीर्षक पौराणिक गांधारी से लिया गया है, लेकिन कहानी और पात्र के कार्यों में वह गहराई या समानता नहीं दिखती जो शीर्षक से अपेक्षित थी।