पैट्रिक ओलिवेल की नई पुस्तक 'अशोक: पोर्ट्रेट ऑफ अ फिलॉसफर किंग' इस बात की पड़ताल करती है कि यदि अशोक का सर्वसमावेशी दृष्टिकोण सफल होता, तो भारत का सामाजिक और राजनीतिक ढांचा आज कैसा होता।
- सम्राट अशोक का दृष्टिकोण केवल बौद्ध धर्म तक सीमित नहीं था, बल्कि सभी धार्मिक परंपराओं के लिए खुला था।
- अशोक के शिलालेखों में जाति (Caste) का कोई उल्लेख नहीं मिलता, जो उस समय के सामाजिक ढांचे के लिए क्रांतिकारी था।
- बौद्धिक विश्लेषण बताता है कि बाद के ब्राह्मणवादी ग्रंथों ने संभवतः अशोक के समावेशी मॉडल के जवाब में वर्ण-आधारित व्यवस्था को मजबूत किया।
पैट्रिक ओलिवेल की कृति 'अशोक: पोर्ट्रेट ऑफ अ फिलॉसफर किंग' हमें एक ऐसे वैकल्पिक इतिहास की कल्पना करने के लिए आमंत्रित करती है, जहाँ सत्ता का आधार हिंसा नहीं, बल्कि 'धम्म' और नैतिक सार्वभौमिकता थी। लेखक अशोक को एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप में चित्रित करते हैं जो अपने समय से बहुत आगे थे। उनके शिलालेख केवल राजकीय आदेश नहीं, बल्कि एक ऐसे राजा की अभिव्यक्ति हैं जिसने स्वयं को एक शिक्षक और मार्गदर्शक के रूप में देखा।
अशोक की सबसे बड़ी विशेषता उनका 'एकुमेनिकल विजन' (सर्वसमावेशी दृष्टिकोण) था। उन्होंने एक ऐसे साझा नैतिक ब्रह्मांड का निर्माण करने का प्रयास किया जिसमें बौद्ध धर्म के साथ-साथ सभी 'पसंदों' (धार्मिक परंपराओं) को स्थान मिले। यह दृष्टिकोण आज के बहुलवादी समाज के लिए एक प्राचीन ब्लूप्रिंट जैसा प्रतीत होता है।
Why This Matters
BozokMedia के विश्लेषण के अनुसार, अशोक का यह मॉडल केवल धार्मिक सहिष्णुता नहीं था, बल्कि एक राजनीतिक प्रयोग था। यदि यह मॉडल स्थायी होता, तो संभवतः भारत में जाति आधारित भेदभाव और सामाजिक स्तरीकरण का वह कठोर स्वरूप कभी विकसित नहीं होता जिसने सदियों तक समाज को विभाजित रखा। यह पुस्तक हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या भारतीय इतिहास में एक ऐसा मोड़ आया था जहाँ हम एक अधिक समतावादी भविष्य की ओर जा सकते थे, लेकिन उसे बदल दिया गया।
युधिष्ठिर जैसे महाकाव्य नायकों का चित्रण संभवतः सम्राट अशोक के समावेशी शासन मॉडल के एक प्रतिक्रियात्मक खंडन के रूप में किया गया था।
इतिहासकारों का तर्क है कि अशोक के बाद के काल में धर्मसूत्र और धर्मशास्त्र परंपराओं ने वर्ण-आधारित आदर्शों को फिर से स्थापित किया। अपस्तम्ब धर्मसूत्र जैसे ग्रंथों को अशोक के समय के करीब माना जाता है, जो संकेत देते हैं कि ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने अशोक के 'जाति-मुक्त' विजन को चुनौती दी थी। यहाँ तक कि रामायण और महाभारत के नायकों को 'ब्रह्मण्य' (ब्राह्मणों के प्रति समर्पित) राजाओं के रूप में प्रस्तुत किया गया, जो अशोक के सार्वभौमिक धम्म के ठीक विपरीत था।
आज जब मनुस्मृति जैसे ग्रंथ पुनः विवादों के केंद्र में हैं, तो अशोक की याद हमें एक ऐसे संसार की कल्पना करने का अवसर देती है जहाँ सामाजिक विभाजन के आधार पर कानून नहीं, बल्कि करुणा और नैतिकता सर्वोपरि थी।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: पैट्रिक ओलिवेल की पुस्तक का मुख्य तर्क क्या है?
मुख्य तर्क यह है कि अशोक ने एक ऐसा समावेशी समाज बनाने की कोशिश की थी जो जाति और संकीर्ण धार्मिक पहचान से ऊपर था, लेकिन बाद के सामाजिक-धार्मिक आंदोलनों ने इस विजन को नकार दिया।
प्रश्न 2: अशोक के विजन और बाद के धर्मशास्त्रों में क्या अंतर था?
अशोक का विजन सर्वसमावेशी और नैतिक था, जबकि बाद के धर्मशास्त्रों ने वर्ण-आधारित पदानुक्रम और सामाजिक स्तरीकरण पर जोर दिया।