प्रकृति फाउंडेशन द्वारा आयोजित 'एट द टेबल विद मालविका सिंह' कार्यक्रम में लेखिका अपनी नई किताब 'कुकिंग फॉर माय फायरफ्लाई' के माध्यम से भोजन और पुरानी दिल्ली की यादों को साझा करेंगी।

  • लेखिका मालविका सिंह अपनी संस्मरण त्रयी के दूसरे भाग 'कुकिंग फॉर माय फायरफ्लाई' पर चर्चा करेंगी।
  • कार्यक्रम 15 सितंबर को चेन्नई के एमेथिस्ट कैफे में आयोजित किया जाएगा।
  • किताब भोजन को यादों, परिवार और बदलते हुए सामाजिक परिवेश से जोड़ने का एक माध्यम है।

प्रसिद्ध लेखिका, प्रकाशक और स्तंभकार मालविका सिंह अपनी नई संस्मरण पुस्तक 'कुकिंग फॉर माय फायरफ्लाई' (Cooking for my Firefly) के माध्यम से चेन्नई में पुरानी दिल्ली की सुनहरी यादों को जीवंत करने के लिए तैयार हैं। प्रकृति फाउंडेशन द्वारा आयोजित 'एट द टेबल विद मालविका सिंह' नामक यह विशेष शाम 15 सितंबर को रॉयपेट्टा स्थित एमेथिस्ट कैफे में आयोजित की जाएगी।

यह पुस्तक केवल व्यंजनों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह भोजन को एक रूपक (metaphor) के रूप में उपयोग करती है। मालविका सिंह ने इस किताब के माध्यम से उन लोगों और पलों को फिर से जिया है जिन्होंने उनके जीवन को आकार दिया। विशेष रूप से, यह किताब उस दौर की कहानी कहती है जो आज की युवा पीढ़ी के लिए केवल एक किस्सा बनकर रह गया है।

भोजन और स्मृतियों का गहरा संबंध

मालविका सिंह के अनुसार, भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि यादों से जुड़ने का एक सेतु है। उन्होंने बताया कि कैसे एक खास तरह की दाल या पकवान उन्हें उनके बचपन की छुट्टियों और दादी की रसोई में ले जाता है। कोविड महामारी के दौरान लिखी गई यह किताब उनके पोते-पोतियों के लिए एक विरासत के रूप में शुरू हुई थी, ताकि वे उस दौर की जीवनशैली को समझ सकें जब भोजन करना एक पवित्र सामाजिक अनुष्ठान हुआ करता था।

"हमारे समय में, साथ मिलकर भोजन करना बहुत महत्वपूर्ण था। यह एक पवित्र परंपरा थी जो परिवारों को जोड़ती थी।"

BozokMedia विश्लेषण दर्शाता है कि मालविका की यह कृति केवल व्यक्तिगत संस्मरण नहीं है, बल्कि यह भारत के बदलते सामाजिक ताने-बाने का एक दस्तावेज़ भी है। जहाँ पहले डाइनिंग टेबल परिवार के संवाद का केंद्र हुआ करती थी, वहीं आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में वह सामाजिक जुड़ाव कहीं खो गया है।

दिल्ली का वह दौर: जब घर सबके लिए खुले थे

अपनी पुस्तक में मालविका ने दिल्ली के उस दौर का भी जिक्र किया है जब घर 'ओपन हाउस' हुआ करते थे। उन्होंने पत्रकार दिलीप पद्मगाँवकर और फिल्म निर्माता मणि कौल जैसे दिग्गजों के साथ बिताए अनौपचारिक पलों को साझा किया है। उन्होंने बताया कि कैसे दोस्त बिना बताए घर आ जाते थे और दाल-चावल खाकर संगीत का आनंद लेते थे।

ऐतिहासिक संदर्भ: बदलता सामाजिक परिवेश

पुराने समय में, सामाजिक मेलजोल के लिए औपचारिक निमंत्रणों से अधिक सहजता और आत्मीयता होती थी। मालविका की यादें उस युग की गवाह हैं जब अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों के दौरान फ्रैंक कैपरा जैसे विश्व प्रसिद्ध निर्देशकों के साथ घर पर डिनर करना एक सामान्य और ज्ञानवर्धक अनुभव होता था।

Did You Know?: मालविका सिंह की यह पुस्तक उनकी संस्मरण त्रयी (Memoir Trilogy) का दूसरा भाग है।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: यह कार्यक्रम कहाँ और कब आयोजित होगा?
उत्तर: यह कार्यक्रम 15 सितंबर को चेन्नई के एमेथिस्ट कैफे में शाम 6:30 बजे से होगा।

प्रश्न 2: क्या इस कार्यक्रम में प्रवेश के लिए पंजीकरण आवश्यक है?
उत्तर: प्रवेश सभी के लिए खुला है, लेकिन बैठने की व्यवस्था के लिए RSVP करना उचित है।