भारतीय सिनेमा में जाति का चित्रण अब केवल पीड़ितों की कहानी तक सीमित नहीं है। 'अछूत कन्या' के दौर से निकलकर 'जयंती 2' तक का सफर सहानुभूति से सीधे राजनीतिक प्रतिरोध की ओर बढ़ गया है।
- भारतीय सिनेमा में जाति का चित्रण अब 'सहानुभूति' से बदलकर 'प्रतिरोध' की ओर बढ़ रहा है।
- पुराने दौर के films में हाशिए के समुदायों को 'पीड़ित' दिखाया जाता था, जबकि नए दौर के फिल्मकार उन्हें 'एजेंसी' और 'शक्ति' के साथ पेश कर रहे हैं।
- 'जयंती 2' जैसी फिल्में अब संस्थागत जातिवाद और आरक्षण जैसे जटिल मुद्दों पर सीधे प्रहार कर रही हैं।
लगभग एक सदी से भारतीय सिनेमा जाति के प्रश्न से जूझ रहा है। 1936 की अछूत कन्या से लेकर 2024 की वेददा तक, जाति सिनेमा के फ्रेम में समय-समय पर आती रही है। लेकिन इन फिल्मों में एक बुनियादी पैटर्न रहा है: हाशिए के समुदायों को अक्सर एक अन्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था के 'पीड़ित' के रूप में दिखाया जाता था।
ऐतिहासिक रूप से, इन कहानियों को अक्सर एक 'सुधारक' या 'उच्च जाति' के नायक के नजरिए से देखा जाता था। इस परंपरा में, समाधान अक्सर विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग के विवेक में खोजा जाता था। एक 'रक्षक' (Saviour) चरित्र कहानी का मुख्य हिस्सा बन जाता था, जो अन्याय को पहचानता है और उसे सुधारने का प्रयास करता है। हालांकि इन फिल्मों ने सहानुभूति पैदा की, लेकिन उन्होंने कभी यह नहीं पूछा कि दबे-कुचले लोगों का प्रतिनिधित्व करने का अधिकार किसके पास है।
बदलती सिनेमाई भाषा
बozokMedia विश्लेषण दर्शाता है कि अब यह परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। अंबेडकरवादी आंदोलन का बढ़ता प्रभाव और दलित-बहुजन समुदायों के बीच बढ़ती राजनीतिक चेतना ने सिनेमा की व्याकरण को बदल दिया है। तमिल सिनेमा, विशेष रूप से पा. रंजीत, मारी सेल्वराज और वेत्रिमारन जैसे निर्देशकों ने इस बदलाव का नेतृत्व किया है।
पा. रंजीत की 'काली' और 'काला' जैसी फिल्मों ने दलित पहचान, इतिहास और संस्कृति को केंद्र में रखा है। ये फिल्में नायक को केवल पीड़ित के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति के रूप में दिखाती हैं जो संघर्ष करता है, संगठित होता है और लड़ता है। अब हाशिए के लोग केवल मुक्ति का इंतजार नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे स्वयं अपनी राजनीतिक नियति के निर्माता हैं।
सिनेमा अब केवल जाति की उपस्थिति दर्ज नहीं करा रहा, बल्कि वह जाति के संरचनात्मक ढांचे को चुनौती दे रहा है।
मराठी सिनेमा में नागराज मंजुले की 'सैराट' और 'फंड्री' ने भी इस दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इसी तरह, हिंदी सिनेमा में नीरज घेवन की 'मसान' और 'गीली पुच्ची' ने पहचान और गरिमा के नए शब्दकोश विकसित किए हैं।
जयंती 2: एक नया मोड़
शैलेश नरवाड़े की फिल्म 'जयंती 2' इस बदलाव का नवीनतम और सबसे सशक्त उदाहरण है। यह फिल्म केवल जातिगत हिंसा के बारे में नहीं है, बल्कि यह शैक्षणिक संस्थानों के भीतर काम करने वाले सूक्ष्म जातिवाद पर प्रहार करती है। यह सवाल उठाती है कि 'योग्यता' (Merit) किसे माना जाता है और किसे 'कोटा' का छात्र कहकर अपमानित किया जाता है।
फिल्म की नायिका, पायल मरकाम, एक मूक पीड़ित नहीं है। वह अपमान का सामना करती है और व्यवस्था से टकराती है। 'जयंती 2' की राजनीति स्पष्ट रूप से अंबेडकरवादी है, जो आरक्षण, योग्यता और सामूहिक न्याय जैसे विषयों पर सीधा संवाद करती है।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: भारतीय सिनेमा में 'सहानुभूति बनाम प्रतिरोध' का क्या अर्थ है?
उत्तर: सहानुभूति का अर्थ है हाशिए के लोगों को दया के पात्र के रूप में दिखाना, जबकि प्रतिरोध का अर्थ है उन्हें शक्ति संपन्न और संघर्षशील पात्रों के रूप में दिखाना।
प्रश्न 2: 'जयंती 2' फिल्म किन मुख्य मुद्दों पर आधारित है?
उत्तर: यह फिल्म शैक्षणिक संस्थानों में जातिवाद, आरक्षण, योग्यता के मानक और अंबेडकरवादी न्याय के सिद्धांतों पर आधारित है।