थिरुवनंतपुरम के मन्नंथला में स्थित Costford का नया पाँच‑मंजिला केंद्र 50 % उपचारित बांस और शेष भाग रीसाइक्ल्ड सामग्री से बना है। यह संरचना कार्बन‑निगेटिव होने के साथ‑साथ स्थानीय संसाधनों के उपयोग को भी बढ़ावा देती है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • इमारत में 50 % उपचारित बांस का उपयोग
  • दरवाज़े‑खिड़कियों सहित सभी सामग्री रीसाइक्ल्ड
  • स्थानीय मिट्टी‑चूना मिश्रण से कार्बन‑निगेटिव फ़्लोर

केरल की राजधानी थिरुवनंतपुरम में स्थित मन्नंथला क्षेत्र में Costford द्वारा निर्मित नया पाँच‑मंजिला टी.आर. चंद्रदत्त सेंटर फॉर अल्टरनेटिव टेक्नोलॉजी देश‑व्यापी सतत निर्माण के लिए एक मानक स्थापित कर रहा है। इस इमारत की प्रमुख विशेषता यह है कि लगभग आधे निर्माण सामग्री के रूप में उपचारित बांस (Bambusa bambos) का उपयोग किया गया है, जबकि शेष भाग पूरी तरह से पुनः उपयोग एवं पुनर्चक्रण‑आधारित सामग्री से तैयार किया गया है।

पृष्ठभूमि और प्रेरणा

Costford, जो ग्रामीण विकास के लिए विज्ञान‑प्रौद्योगिकी केंद्र (Centre of Science and Technology for Rural Development) के नाम से भी जाना जाता है, का इतिहास केरल के पूर्व मुख्यमंत्री सी. अचुता मेनन, प्रसिद्ध वास्तुकार लॉरी बेक़र और अर्थशास्त्री के.एन. राज के साथ जुड़ा है। उनका लक्ष्य किफायती, पर्यावरण‑अनुकूल इमारतों को प्रोत्साहित करना रहा है। 2021 में वित्त मंत्री टी.एम. थॉमस इसाक द्वारा रखे गए पत्थर से शुरू होकर, यह नया केंद्र चंद्रदत्त, एक सामाजिक कार्यकर्ता और संस्थापक, को सम्मानित करने के उद्देश्य से बनाया गया।

डिज़ाइन एवं सामग्री

भवन का मूल ढांचा कंक्रीट का है, परन्तु दीवारें पारम्परिक wattle‑and‑daub तकनीक से बनी हैं, जिनके बाहरी आवरण में बांस की ग्रिल्स लगी हैं। बांस को विशेष रासायनिक उपचार देकर टिकाऊ बनाया गया, जिससे वह नमी, कीट और आग के प्रति प्रतिरोधी बन गया। फर्श की स्लैबें बांस के आधार पर मिट्टी‑चूना मिश्रण (mud screeding) से तैयार की गई हैं, जबकि तीसरी मंजिल पर बांस के समर्थन पर कंक्रीट की परत रखी गई है, जिससे भारी वाहनों के लिए पार्किंग सुविधा मिलती है।

स्थानीय संसाधनों का उपयोग

Costford के निदेशक पी.बी. साजन ने बताया कि सभी खिड़कियाँ, दरवाज़े, ईंटें और ग्रेनाइट पुराने भवनों से पुनः प्राप्त किए गए हैं। फर्श की रंग‑बिरंगी टाइलें भी स्क्रैप सामग्री से इकट्ठा की गई थीं। इस प्रकार न केवल कचरे को कम किया गया, बल्कि स्थानीय कारीगरों को रोजगार भी मिला। बांस की प्रजाति Bambusa bambos केरल में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, जिससे आयातित सामग्री पर निर्भरता घटती है।

भविष्य के प्रभाव

यह परियोजना बांस को ईंट और कंक्रीट के विकल्प के रूप में स्थापित करने का प्रयास करती है। यदि अन्य सार्वजनिक एवं निजी संस्थाएँ इस मॉडल को अपनाएँ, तो निर्माण‑उद्योग में कार्बन उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी संभव है। साथ ही, स्थानीय सामग्री का प्रयोग आर्थिक रूप से लाभदायक सिद्ध हो सकता है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में विकास की नई राहें खुलेंगी।