डाक्शिण कन्नड़ ज़िला पंचायत ने केमराल में एक नई सुविधा चालू की है जो गैर‑रिसाइकल योग्य ड्राई वेस्ट को ऊर्जा पेललेट में बदलती है। यह केंद्र प्रतिदिन दो टन पेललेट बनाकर औद्योगिक बॉयलरों को ईंधन प्रदान करेगा, जिससे परिवहन लागत और पर्यावरणीय भार दोनों घटेंगे।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • केमराल में स्थापित केंद्र प्रतिदिन 2 टन ऊर्जा पेललेट उत्पादन करता है।
  • पेललेट को स्थानीय औद्योगिक इकाइयों में ईंधन के रूप में उपयोग किया जाएगा, जिससे परिवहन लागत में 60% तक कमी आएगी।
  • यह पहल स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के तहत 48 लाख रुपये के निवेश से शुरू हुई और ग्रामीण भारत में मॉडल स्थापित कर रही है।

डाक्शिण कन्नड़ ज़िला पंचायत ने केमराल, मुल्की तालुका में एक नया केंद्र चालू किया है जो गैर‑रिसाइकल योग्य ड्राई वेस्ट को ऊर्जा पेललेट में बदलता है। इस सुविधा की दैनिक उत्पादन क्षमता दो टन है, जिसे स्थानीय शर्करा, शुगरकेन और अन्य औद्योगिक इकाइयों के बॉयलरों में ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा।

पृष्ठभूमि और आवश्यकता

कर्नाटक के कई ग्रामीण क्षेत्रों में कपड़े, चप्पल, एक‑बार उपयोग होने वाले प्लास्टिक जैसी चीज़ें अक्सर कूड़े‑करकट में जमा हो जाती हैं। पहले इन कचरों को बॉल में बाँध कर बेलगावी और उत्तर कर्नाटक के सीमेंट प्लांटों तक ले जाया जाता था, जिससे प्रत्येक लोरी लोड पर लगभग ₹48,000 की लागत आती थी, अर्थात् प्रति किलोग्राम लगभग ₹3 खर्च होता था। स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के तहत डाक्शिण कन्नड़ ने इस लागत को घटाने के लिए नई तकनीक अपनाने का फैसला किया।

परिवर्तनशील प्रक्रिया

केंद्र को ज़िला पंचायत, ग्रामीण जल‑स्वच्छता विभाग, पुर्त taluk पंचायत और केमराल ग्राम पंचायत के सहयोग से स्थापित किया गया। कुल निवेश ₹48 लाख था, जो स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के अंतर्गत मुल्की, मौडबिद्री और मंगलूरु तालुकों को आवंटित किया गया। यहाँ जमा हुए गैर‑रिसाइकल योग्य कचरे को शुद्ध कर, मशीनरी द्वारा ऊर्जा पेललेट में बदला जाता है। ये पेललेट 5 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से पुणे‑स्थित एक कंपनी को बेचे जा रहे हैं।

आर्थिक और पर्यावरणीय प्रभाव

इस पहल से न केवल कचरे के निपटान में सुधार हुआ है, बल्कि औद्योगिक इकाइयों को सस्ते और स्वच्छ ईंधन उपलब्ध हुआ है। परिवहन लागत में अनुमानित 60% की बचत के साथ, हर दिन 22 टन ड्राई वेस्ट में से 60% गैर‑रिसाइकल योग्य भाग को सीधे पेललेट में बदलकर स्थानीय अर्थव्यवस्था को सशक्त किया गया है। साथ ही, कचरे की निपटान से जुड़े ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में भी कमी आएगी, जिससे कर्नाटक के जलवायु लक्ष्य में योगदान मिलेगा।

भविष्य की संभावनाएँ

केमराल मॉडल को देखते हुए, विशेषज्ञों का मानना है कि यह अवधारणा अन्य ग्रामीण जिलों में भी दोहराई जा सकती है, जिससे भारत की कचरा‑से‑ऊर्जा रणनीति को गति मिलेगी। यदि राज्य‑स्तर पर अतिरिक्त वित्तीय समर्थन और तकनीकी साझेदारी बढ़े, तो इस तरह के केंद्रों की संख्या बढ़ाकर राष्ट्रीय स्तर पर टन‑टन कचरे को ऊर्जा में बदलना संभव हो सकता है।