मंगलूरु स्थित मैंगला रिसोर्स मैनेजमेंट ने मुल्की में नई इकाई चालू की, जो प्लास्टिक कचरे को गट्टा (लंबे लम्प) में बदलती है। यह इकाई राज्य‑सरकार के चार मटेरियल रिकवरी फ़ैक्ट्री (MRF) के साथ मिलकर कर्नाटक के ग्रामीण क्षेत्रों में कचरा प्रबंधन को सुदृढ़ करती है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • मुल्की यूनिट LDPE, HM और PP रैफ़िया प्लास्टिक को गट्टा में बदलती है
  • प्रत्येक वर्ष 8,000 टन कचरा पुनः प्रयोगित, 250 गांवों को लाभ
  • प्लास्टिक उद्योगों में PVC पाइप, कुर्सी और बाल्टी निर्माण के लिए उपयोग

मंगलूरु, 12 जुलाई 2026 – इको‑स्टार्ट‑अप मैंगला रिसोर्स मैनेजमेंट प्रा. लि. ने कर्नाटक के मुल्की में नई इकाई चालू की, जो लघु‑घनत्व पॉलीइथिलीन (LDPE), हाई‑मॉलिक्यूलर (HM) और पॉलीप्रोपलीन (PP) रैफ़िया प्लास्टिक को उच्च‑गुणवत्ता वाली गट्टा में बदलती है। यह प्रक्रिया बुनियादी स्तर पर प्लास्टिक की पृथक्करण के बाद द्वितीयक रीसाइक्लिंग की महत्वपूर्ण कड़ी है।

प्लास्टिक रीसाइक्लिंग का नया चरण

कार्यकारी निदेशक रंजन बेल्लरपड़ी के अनुसार, मुल्की यूनिट ने शनिवार को औपचारिक रूप से काम शुरू किया। यह इकाई न केवल प्लास्टिक को बॉल के रूप में परिवहन करती है, बल्कि उसे गट्टा के रूप में तैयार करके सीधे उद्योगों को सप्लाई करती है। इस कदम से लॉजिस्टिक लागत घटती है और कच्चे माल की उपलब्धता में सुधार होता है।

स्थानीय अर्थव्यवस्था और पर्यावरण पर प्रभाव

प्रबंध निदेशक दिलराज अलवा ने बताया कि गट्टा का उपयोग PVC पाइप, प्लास्टिक कुर्सी और बाल्टियों के निर्माण में होता है, जिससे स्थानीय निर्माण उद्योग को कच्चे माल की स्थिर आपूर्ति मिलती है। इसके अलावा, कंपनी पहले ही नौडु, कर्कला, बंटवाल, येडापडावु और पुट्टूर तालुकों में चार MRF संचालित कर रही है, जहाँ 250 गांवों से 8,000 टन कचरा प्रतिवर्ष पुनः उपयोगित किया जाता है।

कुशल कचरा प्रबंधन की दिशा में कदम

मैंगला रिसोर्स का मॉडल ग्रामीण स्तर पर 30 प्रकार के सूखे कचरे की वर्गीकरण करता है। कंपनी के आंकड़ों के अनुसार, एकत्रित कचरे का 45% पुनः उपयोगी सामग्री है, जबकि शेष 55% को सिलिका कारखानों में भेजा जाता है। यह दोहरी प्रक्रिया न केवल लैंडफिल में जमा कचरे को घटाती है, बल्कि कच्चे माल की नवीनीकरण दर को भी बढ़ाती है।

भविष्य की योजना और विस्तार

मुल्की इकाई के सफल संचालन के बाद, कंपनी ने कहा है कि वह कर्नाटक के अन्य ग्रामीण जिलों में समान इकाइयों की स्थापना का लक्ष्य रखती है। यह पहल दक्षिण भारत में सर्कुलर इकोनॉमी के निर्माण में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर बन सकती है।