गाल्टाजी मंदिर में भक्तों द्वारा बंदरों को मीठा खिलाने से उत्पन्न त्वचा रोग (हाइपरकेरेटोसिस) ने कई प्राइमेट्स को चलने‑फिरने से रोक दिया है। वन अधिकारियों ने चेतावनी जारी कर संक्रमित प्राणियों को चिड़ियाघर में इलाज के लिए भेजा है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- भक्तों द्वारा बंदरों को मीठा खिलाने से हाइपरकेरेटोसिस रोग फैल रहा है।
- रोग के कारण बाल झड़ना, त्वचा फटना और चलने‑फिरने में कठिनाई।
- वन अधिकारी चेतावनी, जागरूकता अभियान और संक्रमित प्राणियों को जयपुर चिड़ियाघर में उपचार के लिए स्थानांतरित कर रहे हैं।
जैपुर के 18वीं सदी के ऐतिहासिक गाल्टाजी मंदिर, जिसे अक्सर ‘बंदर मंदिर’ कहा जाता है, में हाल ही में एक गंभीर त्वचा रोग का प्रकोप देखा गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, भक्तों द्वारा बंदरों को चना, मखाना, लड्डू और अन्य मीठे पदार्थ खिलाने से उनके प्राकृतिक आहार में बदलाव आया है, जिससे हाइपरकेरेटोसिस (भारी त्वचा सूखना) का प्रसार हो रहा है।
रोग की प्रकृति और लक्षण
हाइपरकेरेटोसिस एक ऐसी स्थिति है जिसमें त्वचा अत्यधिक सूख कर फट जाती है, रक्तस्राव होता है और बाल झड़ जाते हैं। गाल्टाजी के मैकाक और लंगूर इस रोग से ग्रसित हो कर पेड़‑पेड़ पर चढ़ने, कूदने और चलने‑फिरने में असमर्थ हो रहे हैं। स्थानीय निवासियों ने बताया कि कई बंदर अब पूरी तरह से अचल हो चुके हैं, जिससे उनका जीवन संकट में पड़ गया है।
पशु चिकित्सक और वन अधिकारियों की प्रतिक्रिया
वरिष्ठ वन्यजीव पशु चिकित्सक आशोक तंवार ने बताया, “2020 से कई मामलों का सफल उपचार किया गया है, परन्तु मीठे भोजन की निरंतर आपूर्ति रोग को फिर से बढ़ा रही है।” उन्होंने कहा कि प्राकृतिक आहार – जड़ें, फल, सब्जियाँ और पत्तियाँ – ही इन प्राइमेट्स की सेहत के लिए आवश्यक है। क्षेत्रीय वन अधिकारी जितेंद्र सिंह शेखावत ने कहा, “हमने मंदिर के आसपास चेतावनी संकेत लगाए हैं और नियमित जागरूकता अभियानों के माध्यम से लोगों को बंदरों को मीठा न देने की अपील की है।”
समुदाय और सरकार की भूमिका
स्थानीय सामाजिक संगठनों और वन्यजीव प्रेमियों ने भी इस मुद्दे पर आवाज़ उठाई है। रोहित गंगवाल, एक वन्यजीव उत्साही, ने कहा, “भक्तों का इरादा अच्छा हो सकता है, परंतु लड्डू, बिस्कुट और आइस‑क्रीम जैसे अत्यधिक शर्करा वाले खाद्य पदार्थों से बंदर पाचन संबंधी समस्याओं और रोगों का शिकार बनते हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि यदि जल्द ही लोगों की आदतें बदलें और बंदरों को उनका प्राकृतिक आहार मिले, तो रोग को नियंत्रित किया जा सकता है।
भविष्य की दिशा
जैपुर नगर निगम ने वन अधिकारियों के साथ मिलकर रोगग्रस्त बंदरों को पकड़कर जयपुर चिड़ियाघर में उपचार हेतु ले जाने की प्रक्रिया तेज़ कर दी है। हालांकि, इन जानवरों की चपलता के कारण पकड़ना कठिन है, इसलिए अतिरिक्त टीमों को तैनात किया गया है। विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यदि इस प्रथा को नहीं रोका गया तो गाल्टाजी के प्राइमेट्स की आबादी में बड़े पैमाने पर गिरावट आ सकती है, जिससे पर्यटन और सांस्कृतिक धरोहर दोनों को नुकसान होगा।