श्रेणी कलाकार श्रुति नगराज ने 'मावु' के माध्यम से बेंगलुरु के मौसमी आम के जीवन‑चक्र को 3डी स्कैन, ASCII टाइपोग्राफी और ध्वनि रिकॉर्डिंग के साथ दस्तावेज़ किया। यह प्रोजेक्ट लंदन के साचि गैलरी में एआर अनुभव के रूप में प्रदर्शित हुआ और जल्द ही भारत में वापस लाने की योजना है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • श्रुति नगराज ने बेंगलुरु के आम के बागों को 3D स्कैन किया।
  • ‘मावु’ प्रोजेक्ट में ASCII टाइपोग्राफी और ऑडियो रिकॉर्डिंग का मिश्रण है।
  • जलवायु परिवर्तन और AI डेटा सेंटरों के पानी की खपत से आम की किस्में खतरे में हैं।

लंदन स्थित मल्टीमीडिया कलाकार श्रुति नगराज ने पिछले गर्मियों में बेंगलुरु लौटकर अपने जन्मस्थान के आम के मौसम को डिजिटल रूप में संरक्षित करने का संकल्प लिया। वह कहती हैं, “जलवायु परिवर्तन और जल‑गहन AI डेटा‑सेंटरों के कारण आम का पारिस्थितिक तंत्र अस्थिर हो रहा है, इसलिए इस क्षणभंगुर मौसम को दस्तावेज़ करना अनिवार्य था।”

बहु‑माध्यमीय अभिलेख का निर्माण

‘मावु’ प्रोजेक्ट में बेंगलुरु के गंधर्व कृषि विज्ञान केंद्र (GKVK) के बागों में 3D फोटोग्रामेट्री, ASCII‑प्रेरित टाइपोग्राफी और बगीचे की ध्वनियों को मिलाकर एक विस्तृत डिजिटल संग्रह तैयार किया गया। इस संग्रह को लंदन की साचि गैलरी में ब्रिटिश आर्ट फेयर के दौरान ऑगमेंटेड रियलिटी (AR) इंटरेक्टिव प्रदर्शनी के रूप में प्रस्तुत किया गया, जहाँ दर्शक अपने स्मार्टफ़ोन के माध्यम से आम के जीवन‑चक्र को देख और सुन सकते थे।

स्थल‑संकलन और शोध पद्धति

परियोजना के दौरान नगराज ने बेंगलुरु के कई मौसमी बागों, जयामहल के बाजारों और स्थानीय विक्रेताओं के साथ गहन साक्षात्कार किए। उन्होंने फोटोग्रामेट्री के जरिए पेड़ और फल की 3D स्कैनिंग की, साथ ही बागों की ambient ध्वनि, व्यापार की आवाज़ और फलों के पकने की आवाज़ को रिकॉर्ड किया। इस वर्ष केवल 5 लाख टन आम का उत्पादन जलवायु‑अत्यधिक घटनाओं जैसे एल निनो और अनियमित मानसून के कारण घटा, जिससे बड़ी मात्रा में फसल बर्बाद हुई।

संस्कृति, पारिस्थितिकी और भविष्य की दिशा

‘मावु’ न केवल एक कलात्मक प्रयोग है, बल्कि बेंगलुरु की सांस्कृतिक पहचान और पारिस्थितिक तंत्र को संरक्षित करने का एक साहसिक प्रयास है। श्रुति ने कहा कि वह इस डिजिटल अभिलेख को रीयल‑टाइम मौसम डेटा और बोटैनिकल जानकारी के साथ विस्तारित करने की योजना बना रही हैं, ताकि आम की विविधता को भाषा और डिज़ाइन के माध्यम से व्यापक जनता तक पहुँचाया जा सके। वर्तमान में फंडिंग की तलाश में हैं, लेकिन जल्द ही इस परियोजना को भारत में फिर से स्थापित करने की प्राथमिकता के रूप में रखी गई है।

निष्कर्ष

‘मावु’ दर्शाता है कि कला, प्रौद्योगिकी और पर्यावरणीय जागरूकता कैसे आपस में जुड़ कर एक खोती हुई परंपरा को फिर से जीवंत बना सकती है। इस पहल से भविष्य में जल‑संकट और जलवायु‑परिवर्तन के प्रभावों के खिलाफ अधिक ठोस नीतियों की आवश्यकता स्पष्ट होती है।