संयुक्त राज्य के मानवाधिकार कार्यक्रम से जुड़े विद्वानों ने असम के आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता प्रणब डोली की तुरंत रिहाई की मांग की है। डोली को काज़ीरंगा नेशनल पार्क के निकट लक्ज़री होटल और ‘टी ट्राइब्स’ संग्रहालय के निर्माण को रोकने के शांतिपूर्ण विरोध के बाद गिरफ्तार किया गया था।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- प्रणब डोली को काज़ीरंगा के पास होटल निर्माण विरोध में गिरफ्तार किया गया
- अमेरिकी मानवाधिकार विद्वानों ने उनकी रिहाई और सभी आरोपों के वापस लेने की मांग की
- यह मामला असम में आदिवासी भूमि अधिकार और पर्यावरण संरक्षण के बड़े संघर्ष को उजागर करता है
प्रणब डोली, 40 वर्षीय मीशिंग समुदाय के सदस्य, ने 12 जुलाई को गुवाहाटी में हिरासत में ले लिया गया और अगले दिन 3.20 बजे गोंगलघाट के बोकाखाट पुलिस स्टेशन में गिरफ्तार किया गया। उन पर ‘हिंसक विरोध’ का आरोप लगाया गया, जबकि उन्होंने काज़ीरंगा नेशनल पार्क के किनारे प्रस्तावित लक्ज़री होटल और टी ट्राइब्स संग्रहालय के विरुद्ध शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया था।
पृष्ठभूमि और विवाद
काज़ीरंगा नेशनल पार्क, जो अपने एक-सिंग वाले गैंडे के लिए विश्व प्रसिद्ध है, आस-पास के आदिवासी किसानों की पारंपरिक खेती और चराई की जमीन को ले कर कई बार विवादों में रहा है। असम सरकार ने एटीडीसी (Assam Tourism Development Corporation) को इन जमीनों पर होटल और संग्रहालय बनाने के लिए 30 बीघा (लगभग 9.9 एकड़) आवंटित किए। स्थानीय आदिवासी समूह, जिसमें डोली प्रमुख हैं, ने इन भूमि पुनः वर्गीकरण को अनैतिक और पर्यावरणीय रूप से हानिकारक कहा है।
अमेरिकी विद्वानों की प्रतिक्रिया
यूनिवर्सिटी ऑफ़ एरिज़ोना के इंडिजिनस राइट्स और प्रोटेक्टेड एरिया इनीशिएटिव (IPLP) ने डोली की गिरफ्तारी को ‘अवैध’ और ‘अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार प्रतिबद्धताओं का उल्लंघन’ कहा। उन्होंने कहा, “हम उनके तुरंत और बिना शर्त रिहा होने की मांग करते हैं तथा अभिव्यक्ति, शांतिपूर्ण सभा और समुदायिक अधिकारों के प्रयोग के कारण लगाए गए सभी आरोपों को वापस लेने की भी माँग करते हैं।”
कानूनी और सामाजिक प्रभाव
डोली पर भारतीय न्याय संहिता के कई धारा लागू की गई हैं, जिनमें आपराधिक साजिश, अवैध सभा, दंगे, सार्वजनिक अधिकारी पर हमले आदि शामिल हैं। यह आरोप असम हाई कोर्ट में चल रहे 20 आदिवासी परिवारों के याचिका के बीच आया, जिसमें जमीन की अधिग्रहण, बाड़ निर्माण और पर्यावरणीय प्रभाव आकलन की कमी पर सवाल उठाए गए थे। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की कार्रवाई से अन्य समुदायों के अधिकारों पर ‘शीत प्रभाव’ पड़ेगा।
भविष्य की दिशा
यदि डोली को जारी नहीं किया गया तो यह असम के आदिवासी आंदोलन के लिए एक कड़ी शत्रुता बन सकती है, जिससे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की मानवाधिकार स्थिति पर प्रश्न उठेंगे। पर्यावरणीय संगठनों और स्थानीय समुदायों ने इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाने का आवाहन किया है, जिससे सरकार को अधिक पारदर्शी और सतत विकास नीतियों की ओर धकेला जा सकता है।