इंडोनेशिया ने कचरा प्रबंधन में कड़े उपाय अपनाकर मीथेन उत्सर्जन में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की है, जिससे कचरे की पहाड़ी पर रहने वाले लोगों की जीवनशैली में सुधार आया है। यह कदम न केवल स्थानीय स्वास्थ्य को लाभ पहुँचाता है बल्कि वैश्विक जलवायु लक्ष्य में भी योगदान देता है।
मुख्य बिंदु
- नए नियमों से लैंडफ़िल में मीथेन उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी आई है।
- कचरे की पहाड़ी पर रहने वाले श्रमिकों की स्वास्थ्य और सुरक्षा में सुधार देखा गया।
- यह मॉडल अन्य विकासशील देशों के लिए उदाहरण बन सकता है।
इंडोनेशिया, विश्व का तीसरा सबसे बड़ा कचरा उत्पादक, ने लैंडफ़िल प्रबंधन को सख्त कर और कचरा‑ऊर्जा परियोजनाओं को लागू कर मीथेन उत्सर्जन में महत्वपूर्ण गिरावट की घोषणा की है।
कचरे की पहाड़ी पर जीवन
वर्षों से अनौपचारिक श्रमिक जकार्ता के निकट स्थित विशाल लैंडफ़िल की ढलानों पर रहकर रीसायक्लेबल सामग्री एकत्र करते आए हैं और विषाक्त धुएँ का सामना करते रहे हैं। पर्यावरण मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार मीथेन स्तर में 30% की गिरावट आई है, जिससे समुदाय को पहले की तुलना में साफ़ हवा मिल रही है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
यह लैंडफ़िल, आधिकारिक रूप से तानजुंग प्रिओक कचरा स्थल के नाम से जाना जाता है, 2000 के दशक की शुरुआत में शहरी कचरे में तेज़ वृद्धि के कारण तेज़ी से विस्तारित हुआ। इसकी ऊँची ढेरों को “कचरे की पहाड़ी” कहा गया, जो इंडोनेशिया की कचरा संकट का प्रतीक बन गया और मीथेन उत्पादन का प्रमुख केंद्र था।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि यह कमी न केवल स्थानीय वायु गुणवत्ता में सुधार लाती है बल्कि वैश्विक जलवायु लक्ष्य में भी योगदान देती है, जिससे उभरते हुए आर्थिक देशों को विकास और पर्यावरणीय संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करने का मार्ग दिखता है।
“लैंडफ़िल से मीथेन को स्रोत पर ही कम करना सबसे किफ़ायती जलवायु समाधान है,” डॉ. माया सरी, विश्वविद्यालय ऑफ़ इंडोनेशिया की जलवायु विशेषज्ञ ने कहा।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: मीथेन उत्सर्जन को कैसे मापा गया? सरकार ने लैंडफ़िल के चारों ओर निरंतर मॉनिटरिंग स्टेशन स्थापित किए।
प्रश्न 2: क्या कचरे की पहाड़ी का आकार घटेगा? चल रहे कम्पोस्टिंग और रीसाइक्लिंग कार्यक्रम अगले पाँच वर्षों में लैंडफ़िल को 15% तक घटाने का लक्ष्य रखते हैं।