मंगोलिया के उलानबटोर में आयोजित मरुस्थलीकरण से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (UNCCD) के पक्षकारों के 17वें सम्मेलन (CoP 17) का समापन भूमि की सक्रिय बहाली और सूखा लचीलेपन पर जोर के साथ हुआ। भारत ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, अपनी पहली 'घास के मैदानों पर मार्गदर्शिका' जारी की और मरुस्थलीकरण से निपटने के लिए मजबूत अंतरराष्ट्रीय वित्तपोषण की वकालत की।
- UNCCD मरुस्थलीकरण और सूखे के प्रभावों को संबोधित करने के लिए एकमात्र कानूनी रूप से बाध्यकारी ढाँचा है।
- CoP 17 का विषय "भूमि को बहाल करना। आशा को बहाल करना।" था, जिसमें भूमि क्षरण से निपटने के लिए वैश्विक प्रतिबद्धता पर जोर दिया गया।
- भारत ने CoP 17 में अपनी पहली 'भारत के घास के मैदानों और अन्य खुले प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्रों (ONEs) पर मार्गदर्शिका' लॉन्च की, जो उनके संरक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है।
- सम्मेलन में सूखा प्रतिक्रिया से सक्रिय, प्रौद्योगिकी-सक्षम सूखा लचीलेपन की ओर वैश्विक बदलाव का आह्वान किया गया।
- भारत ने भूमि बहाली और सूखा लचीलेपन के लिए विविध और सतत अंतरराष्ट्रीय वित्तपोषण की आवश्यकता पर बल दिया।
मंगोलिया के उलानबटोर में 17 से 28 अगस्त 2026 तक आयोजित मरुस्थलीकरण से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (UNCCD) के पक्षकारों के 17वें सम्मेलन (CoP 17) ने वैश्विक पर्यावरण एजेंडे में भूमि बहाली और सूखा लचीलेपन के मुद्दों को केंद्रीय मंच पर ला दिया है। "भूमि को बहाल करना। आशा को बहाल करना।" के विषय के तहत आयोजित इस सम्मेलन ने मरुस्थलीकरण, भूमि क्षरण और सूखे (DLDD) के बढ़ते खतरों से निपटने के लिए देशों के बीच सहयोग और प्रतिबद्धता को मजबूत करने की मांग की। भारत ने इस महत्वपूर्ण वैश्विक मंच पर एक सक्रिय और अग्रणी भूमिका निभाई, जिसमें महत्वपूर्ण नीतियां और पहल प्रस्तुत की गईं।
UNCCD, 1994 में स्थापित, भूमि से संबंधित मुद्दों पर एक प्रमुख वैश्विक समझौता है, जिसका उद्देश्य भूमि की रक्षा और बहाली करना और मरुस्थलीकरण की घटना को संबोधित करना है। मरुस्थलीकरण वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से उपजाऊ और उत्पादक भूमि कृषि जैसी उपयोगी गतिविधियों के लिए अनुपयुक्त हो जाती है। यह मरुस्थलीकरण और सूखे के प्रभावों को संबोधित करने के लिए एकमात्र कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतर्राष्ट्रीय ढाँचा है, जिसमें 196 देश पक्षकार और यूरोपीय संघ सहित 197 पक्षकार शामिल हैं। पक्षकारों का सम्मेलन (CoP) इसका मुख्य निर्णय लेने वाला निकाय है, जो 2001 से द्विवार्षिक रूप से बैठक करता है।
CoP 17 की प्रमुख बातें और भारत का योगदान
CoP 17 में भारत ने कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर जोर दिया। सबसे पहले, भारत ने चारागाहों की समुदाय-नेतृत्व वाली बहाली की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया। भारत ने चारागाहों के महत्व पर प्रकाश डाला, जो चरवाहा समुदायों को बनाए रखने, जैव विविधता के संरक्षण और जल तथा कार्बन चक्रों को विनियमित करने में महत्वपूर्ण हैं। यह दृष्टिकोण स्थानीय समुदायों को भूमि बहाली प्रयासों में भागीदार के रूप में सशक्त बनाने के लिए भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
दूसरे, भारत ने वैश्विक दृष्टिकोण में सूखा प्रतिक्रिया से सूखा लचीलेपन की ओर एक मौलिक बदलाव का आह्वान किया। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने प्रतिक्रियाशील राहत से सक्रिय, प्रौद्योगिकी-सक्षम लचीलेपन की ओर बढ़ने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने भारत के समन्वित, बहु-संस्थागत दृष्टिकोण पर भी प्रकाश डाला, जिसमें प्रारंभिक चेतावनी, शमन, राहत और सामुदायिक लचीलेपन को एकीकृत किया गया है। यह दृष्टिकोण भविष्य की सूखा घटनाओं के लिए अधिक टिकाऊ और निवारक रणनीति की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
तीसरे, भारत ने CoP 17 में भारत के घास के मैदानों और अन्य खुले प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्रों (ONEs) पर अपनी पहली मार्गदर्शिका लॉन्च की। यह मार्गदर्शिका भारत के घास के मैदानों और ONEs की समृद्ध विविधता, पारिस्थितिक महत्व और सामाजिक-आर्थिक महत्व को उजागर करती है। यह हिमालयी और तराई के घास के मैदानों से लेकर थार और बन्नी परिदृश्यों, पथरीले पठारों, खड्डों, झाड़ियों, दक्कन के सवाना, तटीय पारिस्थितिक तंत्रों और रेगिस्तानी परिदृश्यों तक प्रमुख ONEs पर जानकारी एकत्र करती है। मंत्री भूपेंद्र यादव ने इस मार्गदर्शिका को भारत के खुले प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्रों को पहचानने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया और वनों के साथ-साथ उनके विज्ञान-आधारित संरक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया।
अंत में, भारत ने भूमि बहाली और सूखा लचीलेपन के लिए विविध और सतत अंतरराष्ट्रीय वित्तपोषण का आह्वान किया। मंत्री यादव ने इस बात पर जोर दिया कि भूमि का क्षरण एक लागत नहीं, बल्कि भोजन, पानी, जैव विविधता, आजीविका और दीर्घकालिक लचीलेपन में एक निवेश है। उन्होंने जलवायु-परिवर्तन अनुकूलन, टिकाऊ भूमि उपयोग, वानिकी और कृषि, वनीकरण और जैव विविधता संरक्षण के लिए वित्तपोषण को सक्षम करने वाले भारत के मिश्रित हरित-वित्त ढांचे को भी उजागर किया।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि UNCCD CoP 17 के परिणाम वैश्विक स्थिरता, खाद्य सुरक्षा और जैव विविधता संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण हैं। भूमि क्षरण और मरुस्थलीकरण न केवल पारिस्थितिक तंत्र को खतरे में डालते हैं बल्कि लाखों लोगों की आजीविका को भी प्रभावित करते हैं, जिससे प्रवास और संघर्ष बढ़ सकते हैं। भारत जैसे देशों द्वारा सक्रिय उपाय और अंतरराष्ट्रीय सहयोग इन चुनौतियों से निपटने और एक अधिक लचीला भविष्य बनाने के लिए आवश्यक हैं।
“भूमि बहाली केवल एक पर्यावरणीय अनिवार्यता नहीं है, बल्कि एक सामाजिक-आर्थिक आवश्यकता है जो अरबों लोगों के लिए भोजन, पानी और आजीविका सुरक्षा सुनिश्चित करती है।”
नगदी से परे: मरुस्थलीकरण और सूखे से निपटने का विश्व दिवस और बॉन चैलेंज
UNCCD के तहत हर साल 17 जून को मरुस्थलीकरण और सूखे से निपटने का विश्व दिवस मनाया जाता है। यह दिन मरुस्थलीकरण, भूमि क्षरण और सूखे के खिलाफ जागरूकता बढ़ाने और कार्रवाई को बढ़ावा देने के लिए एक वैश्विक मंच के रूप में कार्य करता है। इस वर्ष का विषय "चारागाह: पहचानें। सम्मान करें। बहाल करें।" था। उल्लेखनीय है कि संयुक्त राष्ट्र ने 2026 को चारागाहों और चरवाहों के अंतर्राष्ट्रीय वर्ष (IYRP) के रूप में घोषित किया है, जो इन महत्वपूर्ण पारिस्थितिक तंत्रों के महत्व को दर्शाता है।
भारत ने 2011 और 2020 के बीच 21.7 मिलियन हेक्टेयर खराब और वनों की कटाई वाली भूमि को बहाल किया है, जैसा कि पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और प्रकृति के संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ (IUCN) द्वारा 17 जून, 2026 को जारी बॉन चैलेंज पर देश की दूसरी प्रगति रिपोर्ट में बताया गया है। इसमें लगाए गए वनों, प्राकृतिक पुनर्जनन, सिल्वीकल्चर, कृषि-वानिकी और मैंग्रोव बहाली के माध्यम से बहाली शामिल है। बॉन चैलेंज 2011 में जर्मनी सरकार और IUCN के प्रयासों से शुरू की गई एक वैश्विक पहल है, जिसमें IUCN बॉन चैलेंज के सचिवालय के रूप में कार्य करता है।
Frequently Asked Questions
- UNCCD का प्राथमिक उद्देश्य क्या है?
- भारत वैश्विक भूमि बहाली प्रयासों में कैसे योगदान दे रहा है?