भू-वैज्ञानिक सी.पी. राजेंद्रन ने चेतावनी दी है कि नेपाल में आई भीषण बाढ़ हिमालयी क्षेत्र में अंधाधुंध निर्माण कार्यों के प्रति एक गंभीर चेतावनी है। उन्होंने पारिस्थितिक संतुलन की अनदेखी कर बनाए जा रहे बांधों और राजमार्गों को भविष्य की आपदाओं का मुख्य कारण बताया है।

  • नेपाल की बाढ़ केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि पारिस्थितिक लापरवाही का परिणाम है।
  • ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और 'ब्लैक कार्बन' के जमाव से हिमालयी क्षेत्र अस्थिर हो रहा है।
  • भारत, चीन और नेपाल में बुनियादी ढांचे का अनियंत्रित विस्तार आपदाओं के जोखिम को बढ़ा रहा है।

नेपाल में आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड (अचानक आई बाढ़) ने पूरे दक्षिण एशिया को झकझोर कर रख दिया है। बेंगलुरु स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज के एडजंक्ट प्रोफेसर और प्रसिद्ध भू-वैज्ञानिक सी.पी. राजेंद्रन के अनुसार, यह त्रासदी उन सरकारों के लिए एक 'रियलिटी चेक' है जो हिमालय की नाजुक पहाड़ियों में बांधों, सुरंगों, राजमार्गों और रेलवे का जाल बिछाने की होड़ में लगे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटना 2013 की केदारनाथ त्रासदी और 2021 की चमोली आपदा जैसी ही है। वर्तमान साक्ष्य संकेत देते हैं कि उच्च हिमालयी क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर ग्लेशियर के ढहने और भूस्खलन के कारण यह तबाही मची है। जलवायु परिवर्तन के कारण 'परमाफ्रॉस्ट' (जमी हुई चट्टानें और मिट्टी) पिघल रही है, जिससे ढलान और भी अस्थिर हो गए हैं।

Why This Matters

BozokMedia analysis shows कि हिमालयी क्षेत्र, जिसे 'तीसरा ध्रुव' कहा जाता है, अब एक नाजुक मोड़ पर है। जब हम पारिस्थितिक प्रभाव की अनदेखी कर भारी निर्माण करते हैं, तो हम नदियों की प्राकृतिक दक्षता को कम कर देते हैं। इससे पानी का बहाव बाधित होता है और मोराइन (मलबा) के पीछे बने ग्लेशियर झीलें (GLOF) फट जाती हैं, जो नीचे बसे शहरों के लिए काल बन जाती हैं।

हिमालयी पर्यावरण व्यवस्था अब पूरी तरह ढहने की कगार पर है, क्योंकि टिकाऊ विकास के बजाय केवल संसाधनों के दोहन पर जोर दिया जा रहा है।

एक अन्य गंभीर समस्या 'ब्लैक कार्बन' या कालिख का जमाव है। पर्यटन और वाहनों से निकलने वाला धुआं बर्फ की सतह को काला कर रहा है, जिससे सूर्य की गर्मी अधिक अवशोषित होती है और ग्लेशियर तेजी से पिघलते हैं। एरीज (ARIES) के वैज्ञानिकों के अध्ययन से पता चला है कि इस क्षेत्र में कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन का स्तर वैश्विक औसत से भी अधिक तेजी से बढ़ रहा है।

ऐतिहासिक रूप से, हिमालय ने हमेशा से क्षेत्रीय जलवायु को नियंत्रित किया है, लेकिन पिछले एक दशक में बुनियादी ढांचे की होड़ ने इस संतुलन को बिगाड़ दिया है। यदि समय रहते ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम नहीं किया गया और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों (Early Warning Systems) में निवेश नहीं किया गया, तो भविष्य में ऐसी आपदाएं और अधिक घातक होंगी।

क्या आप जानते हैं?: हिमालय को दुनिया का 'तीसरा ध्रुव' (Third Pole) कहा जाता है क्योंकि आर्कटिक और अंटार्कटिका के बाद यहाँ दुनिया का सबसे बड़ा बर्फ और हिम भंडार है।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: GLOF क्या है और यह क्यों खतरनाक है?
उत्तर: GLOF का अर्थ है 'ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड'। जब ग्लेशियर के पिघलने से बने प्राकृतिक मलबे के बांध टूट जाते हैं, तो लाखों लीटर पानी अचानक नीचे की ओर आता है, जिससे भारी तबाही मचती है।

प्रश्न 2: ब्लैक कार्बन ग्लेशियरों को कैसे प्रभावित करता है?
उत्तर: ब्लैक कार्बन बर्फ की सतह को काला कर देता है, जिससे वह सूर्य की किरणों को परावर्तित करने के बजाय सोखने लगती है, जिससे बर्फ तेजी से पिघलती है।