केंद्र सरकार इलेक्ट्रॉनिक कचरे से दुर्लभ धातुओं को निकालने की योजना बना रही है, लेकिन अनौपचारिक क्षेत्र और डेटा की कमी इसके रास्ते में बड़ी बाधा बनी हुई है।
- भारत में 2022 में लगभग 4.17 मिलियन मीट्रिक टन ई-कचरा उत्पन्न हुआ।
- केवल एक-तिहाई कचरा ही औपचारिक और सुरक्षित माध्यमों से प्रोसेस किया जाता है।
- अनौपचारिक क्षेत्र (Informal Sector) और 'पेपर ट्रेडिंग' जैसी धोखाधड़ी प्रमुख चुनौतियां हैं।
- दुर्लभ मृदा तत्वों (REEs) की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में अस्थिरता के कारण रीसाइक्लिंग महत्वपूर्ण है।
भारत सरकार इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण को बढ़ावा देने के साथ-साथ ई-कचरा रीसाइक्लिंग के क्षेत्र में भी बड़े कदम उठा रही है। हाल ही में घोषित ₹1,500 करोड़ की खनिज रीसाइक्लिंग योजना का उद्देश्य इलेक्ट्रॉनिक्स से तांबा, एल्युमीनियम, निकल, कोबाल्ट और लिथियम जैसी महत्वपूर्ण धातुओं को निकालना है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि नीति निर्माण और जमीनी कार्यान्वयन के बीच एक गहरी खाई मौजूद है।
वर्तमान में, भारत में मोबाइल ब्रॉडबैंड कनेक्शन की संख्या 93.9 करोड़ से अधिक है, जो इलेक्ट्रॉनिक कचरे के भारी बोझ का संकेत देती है। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में अस्थिरता और चीन द्वारा दुर्लभ मृदा तत्वों (REEs) के निर्यात पर प्रतिबंध जैसे भू-राजनीतिक जोखिमों ने भारत के लिए स्वदेशी रीसाइक्लिंग क्षमताओं को विकसित करना अनिवार्य बना दिया है।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यदि भारत अपने ई-कचरे को प्रभावी ढंग से प्रबंधित नहीं करता है, तो वह न केवल पर्यावरणीय संकट का सामना करेगा, बल्कि महत्वपूर्ण कच्चे माल के लिए वैश्विक अस्थिरता पर भी निर्भर रहेगा। एक 'सर्कुलर इकोनॉमी' का निर्माण भारत की तकनीकी संप्रभुता के लिए आवश्यक है।
अनौपचारिक सेटअप नीति निर्माताओं को निराश कर रहे हैं क्योंकि वे बिना किसी औपचारिक ढांचे के काम करते हैं, जिससे कीमती धातुओं का सही दोहन नहीं हो पाता।
भारतीय सेलुलर और इलेक्ट्रॉनिक्स एसोसिएशन (ICEA) की एक रिपोर्ट के अनुसार, ई-कचरा प्रबंधन का एक बड़ा हिस्सा अनौपचारिक क्षेत्र के नियंत्रण में है। ये सेटअप उत्पादों को रिपेयर करने के बजाय उनके घटकों को निकाल लेते हैं, जिससे वे औपचारिक रीसाइक्लिंग प्रक्रिया से बाहर हो जाते हैं। इसके अलावा, 'विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व' (EPR) ढांचे के तहत 'पेपर ट्रेडिंग' के आरोप भी लग रहे हैं, जहाँ कुछ कंपनियां प्रोत्साहन राशि पाने के लिए रीसाइक्लिंग के आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करती हैं।
विशेषज्ञ डॉ. संदीप चटर्जी के अनुसार, धातु निष्कर्षण के लिए तीसरे पक्ष के ऑडिट की सख्त आवश्यकता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि पर्यावरणीय सुरक्षा मानकों का पालन हो रहा है। उन्होंने 'मटेरियल ट्रेसेबिलिटी' (सामग्री की पता लगाने की क्षमता) को भी एक बड़ी समस्या बताया, क्योंकि अनौपचारिक बाजारों में उत्पादों की सटीक इन्वेंट्री रखना लगभग असंभव है।
| विशेषता | औपचारिक क्षेत्र (Formal) | अनौपचारिक क्षेत्र (Informal) |
|---|---|---|
| प्रक्रिया | वैज्ञानिक और सुरक्षित निष्कर्षण | घटक निकालना और रिपेयरिंग |
| पर्यावरणीय प्रभाव | न्यूनतम और नियंत्रित | उच्च प्रदूषण का जोखिम |
| डेटा पारदर्शिता | उच्च (EPR के तहत) | अत्यधिक कम/शून्य |
Frequently Asked Questions
1. EPR क्या है?
EPR यानी 'विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व' एक नीति है जिसके तहत इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माताओं को अपने उत्पादों के जीवनकाल के अंत में उनके कचरे के प्रबंधन की जिम्मेदारी लेनी होती है।
2. ई-कचरे से क्या निकाला जा सकता है?
ई-कचरे से सोना, चांदी, तांबा, लिथियम और कोबाल्ट जैसी कीमती धातुएं निकाली जा सकती हैं।