संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की नई रिपोर्ट वैश्विक तापमान वृद्धि के खतरनाक स्तरों की चेतावनी देती है। भारत को अब जलवायु परिवर्तन के प्रति अपनी रणनीति बदलने की आवश्यकता है।
- वैश्विक तापमान 1.5°C की सीमा को पार कर चुका है, जिससे अपूरणीय क्षति का खतरा है।
- यदि वर्तमान नीतियां जारी रहीं, तो तापमान 2.6°C तक बढ़ सकता है।
- मीथेन उत्सर्जन में कटौती करना ग्लोबल वार्मिंग को धीमा करने का सबसे प्रभावी तरीका है।
- भारत को 'विक्टिम माइंडसेट' छोड़कर जलवायु कार्रवाई में सक्रिय भूमिका निभानी होगी।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की हालिया रिपोर्ट, 'लिमिटिंग ओवरशूट' (Limiting Overshoot), एक गंभीर चेतावनी है कि 1.5°C की वैश्विक तापमान वृद्धि की सीमा को तोड़ने से ऐसे नुकसान होंगे जिन्हें अनुकूलन (adaptation) के माध्यम से ठीक नहीं किया जा सकेगा। रिपोर्ट के अनुसार, यदि सभी देश आज अपने जलवायु वादों को पूरा करते हैं, तो भी दुनिया 1.8°C गर्म होने की राह पर है, और वर्तमान नीतियों के आधार पर यह वृद्धि 2.6°C तक पहुँच सकती है।
वैज्ञानिक वास्तविकता और ओवरशूट का खतरा
वैज्ञानिकों ने अब यह स्वीकार कर लिया है कि हम पहले ही 1.5°C की दुनिया में प्रवेश कर चुके हैं। रिपोर्ट एक 'ओवरशूट, पीक और डिक्लाइन' (overshoot, peak and decline) मार्ग का सुझाव देती है। इस मार्ग के तहत, औसत वैश्विक तापमान 1.5°C से ऊपर चला जाता है, लेकिन देश सामूहिक रूप से इस शिखर को यथासंभव कम रखते हैं और सदी के अंत तक इसे वापस सीमा के नीचे लाने का प्रयास करते हैं।
तापमान में एक अंश की वृद्धि को रोकना, उस वृद्धि को होने से रोकने की तुलना में कहीं अधिक कठिन है।
रिपोर्ट में एक महत्वपूर्ण नया पहलू मीथेन पर ध्यान केंद्रित करना है। मीथेन वर्तमान वार्मिंग के लगभग 0.5°C के लिए जिम्मेदार है। 155 से अधिक देशों ने 'ग्लोबल मीथेन प्लेज' में शामिल होकर 2030 तक मीथेन उत्सर्जन में 30% की कटौती करने का संकल्प लिया है, लेकिन दुर्भाग्य से भारत इस समूह का हिस्सा नहीं है।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि जलवायु परिवर्तन अब केवल एक पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि एक भू-राजनीतिक संघर्ष बन गया है। विकसित और विकासशील देशों के बीच वित्तीय सहायता और तकनीक के हस्तांतरण को लेकर गहरा मतभेद है। भारत जैसे देश तर्क देते हैं कि वे ऐतिहासिक कार्बन उत्सर्जन के शिकार हैं और उन्हें अधिक वित्तीय सहायता मिलनी चाहिए।
हाल ही में नेपाल में हुई भोटेकोषी आपदा ने इस मुद्दे को और संवेदनशील बना दिया है। नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने स्पष्ट किया है कि चीन, अमेरिका और भारत जैसे बड़े उत्सर्जकों को छोटे देशों पर पड़ने वाले प्रभावों पर विचार करना चाहिए।
| परिदृश्य (Scenario) | अनुमानित तापमान वृद्धि |
|---|---|
| सभी जलवायु वादों का पालन | 1.8°C |
| वर्तमान वैश्विक नीतियां | 2.6°C |
| सुरक्षित सीमा (Target) | 1.5°C |
भारत के लिए चुनौती यह है कि दुनिया उसे केवल एक 'पीड़ित' के रूप में नहीं, बल्कि एक बड़े उत्सर्जक के रूप में भी देख रही है। भारत को अपनी वैश्विक छवि और जलवायु संदेश को इस नई वास्तविकता के अनुरूप ढालने की आवश्यकता है।
Frequently Asked Questions
1. 'ओवरशूट' क्या है?
ओवरशूट का अर्थ है वैश्विक तापमान का निर्धारित सीमा (1.5°C) से ऊपर निकल जाना और फिर बाद में उसे कम करने का प्रयास करना।
2. भारत ग्लोबल मीथेन प्लेज में क्यों नहीं है?
भारत अपनी आर्थिक विकास संबंधी जरूरतों और ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इस पर विचार कर रहा है।
Editor Comment
भारत को अब रक्षात्मक रुख छोड़कर नेतृत्वकारी भूमिका अपनानी होगी। जलवायु परिवर्तन के प्रति 'पीड़ित' वाली मानसिकता वैश्विक मंच पर भारत की साख को कमजोर कर सकती है।