हरियाणा के काजलहेड़ी में श्री गुरु गोरखनाथ कम्युनिटी रिजर्व अब कछुओं के लिए जानलेवा बन गया है। अनुपचारित सीवेज और सरकारी लापरवाही के कारण दुर्लभ प्रजातियों के कछुए सुरक्षित पानी की तलाश में सड़कों पर भागने को मजबूर हैं।
- काजलहेड़ी का कम्युनिटी रिजर्व अब प्रदूषण के कारण कछुओं के लिए घातक बन गया है।
- दुर्लभ भारतीय सॉफ्टशेल और पीकॉक कछुए सीवेज के कारण बीमारियों का शिकार हो रहे हैं।
- प्रशासनिक लापरवाही और फंड की कमी के बीच वन्यजीवों का अस्तित्व खतरे में है।
हरियाणा के फतेहाबाद जिले में स्थित काजलहेड़ी गांव का तालाब, जो कभी दुर्लभ कछुओं का सुरक्षित स्वर्ग हुआ करता था, अब उनके लिए एक 'डेथ ट्रैप' यानी मौत का जाल बन चुका है। श्री गुरु गोरखनाथ कम्युनिटी रिजर्व, जिसे हरियाणा सरकार ने 2019 में अधिसूचित किया था, वर्तमान में गंभीर पारिस्थितिक संकट से जूझ रहा है। यहाँ रहने वाले लगभग 150-200 भारतीय सॉफ्टशेल, रेड-रूफेड और इंडियन पीकॉक कछुए अब अपने ही घर में दम तोड़ रहे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, तालाब में बिना उपचारित किए गए सीवेज के बहाव ने पानी को इतना ज़हरीला बना दिया है कि कछुओं में त्वचा के रोग, फंगल संक्रमण और अंधापन जैसे लक्षण देखे जा रहे हैं। स्थिति इतनी भयावह है कि ये कछुए स्वच्छ पानी की तलाश में रिजर्व छोड़कर खेतों और सड़कों पर निकलने को मजबूर हैं, जहाँ अक्सर वाहनों की चपेट में आकर उनकी मौत हो जाती है।
क्यों है यह मामला गंभीर?
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह केवल एक स्थानीय प्रदूषण की समस्या नहीं है, बल्कि वन्यजीव संरक्षण की विफलता का एक ज्वलंत उदाहरण है। ये कछुए वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम की अनुसूची I के तहत आते हैं, जिन्हें बाघ और गैंडे के समान उच्चतम कानूनी सुरक्षा प्राप्त है। इसके अलावा, इन्हें IUCN रेड लिस्ट में भी संकटग्रस्त प्रजातियों के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।
प्रदूषित पानी और प्रशासनिक उदासीनता ने एक संरक्षित अभयारण्य को वन्यजीवों के लिए नरक में बदल दिया है।
वन्यजीव संरक्षणवादी वैशाली राणा ने इस मामले में सख्त रुख अपनाते हुए वन्यजीव अधिकारियों, पंचायत पदाधिकारियों और रिजर्व प्रबंधन समिति के सदस्यों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने की मांग की है। उन्होंने आरोप लगाया है कि अधिकारियों ने जानबूझकर सीवेज को कछुओं के आवास में बहने दिया और जनवरी में मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव), गुरुग्राम द्वारा जारी निर्देशों का पालन करने में विफल रहे।
सुरक्षा और प्रबंधन में विफलता
समस्या केवल प्रदूषण तक सीमित नहीं है। उचित बाड़े (fencing) के अभाव में आवारा कुत्ते रिजर्व में घुसकर कछुओं के अंडों को खा जाते हैं, जबकि तालाब में लाए जाने वाले मवेशी घोंसलों को नष्ट कर देते हैं। प्रशासन का तर्क है कि धन की कमी के कारण सुधारात्मक उपाय नहीं हो पा रहे हैं, लेकिन स्थानीय निवासी इसे अधिकारियों के बीच के 'नेक्सस' और भ्रष्टाचार का परिणाम मान रहे हैं।
Frequently Asked Questions
1. काजलहेड़ी रिजर्व में कौन सी प्रजातियां पाई जाती हैं?
यहाँ मुख्य रूप से भारतीय सॉफ्टशेल, रेड-रूफेड और इंडियन पीकॉक कछुए पाए जाते हैं।
2. कछुओं के अस्तित्व को किन मुख्य खतरों का सामना करना पड़ रहा है?
मुख्य खतरों में सीवेज प्रदूषण, वाहनों से टकराना, आवारा कुत्तों द्वारा अंडों का विनाश और फंड की कमी शामिल है।