ट्रम्प प्रशासन ने मध्यवर्ती चुनावों से पहले मेल‑इन वोटिंग को सीमित करने वाले आदेश को बरकरार रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट में आपराधिक याचिका दायर की। यह कदम 2024 के मध्यावधि चुनावों में मतदाता भागीदारी को प्रभावित कर सकता है।
मुख्य बिंदु
- ट्रम्प प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट में आपराधिक याचिका दायर की
- याचिका का उद्देश्य मेल‑इन वोटिंग को सीमित करने वाले आदेश को बरकरार रखना है
- निर्णय मध्यावधि चुनावों से पहले सुनाया जाना अपेक्षित है
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका
संयुक्त राज्य के ट्रम्प समर्थक प्रशासन ने एक आपराधिक याचिका फाइल की है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया गया है कि वह वर्तमान आदेश को जारी रखे, जो 2022 में मेल‑इन वोटिंग को प्रतिबंधित करता था। प्रशासन का कहना है कि यह आदेश चुनाव की सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
विरोधी पक्ष की प्रतिक्रिया
डेमोक्रैटिक समूहों ने त्वरित राहत की मांग की है, यह तर्क देते हुए कि मेल‑इन वोटिंग का प्रतिबंध संविधान के समान अधिकारों का उल्लंघन करता है। वे इस याचिका को “राजनीतिक हस्तक्षेप” के रूप में देख रहे हैं।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
2018 में, सुप्रीम कोर्ट ने एक समान आदेश को अस्थायी रूप से रोका था, जिससे कई राज्यें मेल‑इन वोटिंग को विस्तारित कर सकीं। 2020 के राष्ट्रपति चुनाव में मेल‑इन वोटिंग का उपयोग 30 % से अधिक मतदाताओं ने किया, जिससे इस मुद्दे पर लगातार बहस चलती रही है।
क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia विश्लेषण दर्शाता है कि इस निर्णय का असर न केवल 2024 के मध्यावधि चुनावों पर पड़ेगा, बल्कि भविष्य की चुनावी नीतियों और मतदाता सहभागिता पर भी दीर्घकालिक प्रभाव डालेगा।
“यदि सुप्रीम कोर्ट इस आदेश को बरकरार रखता है, तो यह मेल‑इन वोटिंग की पहुंच को सीमित करेगा और संभावित रूप से कई मतदान अधिकारों को प्रभावित कर सकता है।” – चुनाव कानून विशेषज्ञ डॉ. अनिल शर्मा
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: यह याचिका किस अदालत में दायर हुई है?
उत्तर: यह याचिका संयुक्त राज्य सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई है।
प्रश्न 2: यदि सुप्रीम कोर्ट आदेश को बरकरार रखता है, तो अगले चुनाव में क्या बदल सकता है?
उत्तर: कई राज्य में मेल‑इन वोटिंग की उपलब्धता घट सकती है, जिससे मतदान प्रक्रिया में बदलाव आएगा।