दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने 26 साल से फरार जीवनकैदी अमित यादव को देहरादून से गिरफ्तार किया है। आरोपी ने अपनी पहचान बदलकर शहर में बिल्डर के रूप में नया जीवन शुरू किया था।

  • 1995 के अपहरण मामले में दोषी अमित यादव 26 साल बाद गिरफ्तार।
  • आरोपी ने देहरादून में अपनी पहचान बदलकर बिल्डर का व्यवसाय शुरू किया था।
  • बायोमेट्रिक रिकॉर्ड्स की मदद से क्राइम ब्रांच ने आरोपी का पता लगाया।

देहरादून और दिल्ली के बीच एक लंबे समय से चले लुका-छिपी के खेल का अंत हुआ है। दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने एक ऐसे अपराधी को दबोचा है जिसने न केवल कानून को धोखा दिया, बल्कि दशकों तक एक फर्जी पहचान के साथ समाज में सम्मानजनक स्थान भी बनाया। 57 वर्षीय अमित यादव, जिसे 1995 के एक सनसनीखेज अपहरण मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी, पिछले 26 वर्षों से फरार चल रहा था।

यह मामला सितंबर 1995 का है, जब ऋषि सेठी का अपहरण उनके ही वाहन से किया गया था। अपहरणकर्ताओं ने सेठी के परिवार से 1 करोड़ रुपये की फिरौती मांगी थी। पुलिस जांच के अनुसार, मेरठ के एक होटल में 10 लाख रुपये की रकम रखी गई थी, जिसे वसूलने के दौरान अमित यादव को पहली बार गिरफ्तार किया गया था। पुलिस ने गाजियाबाद के एक किराए के मकान से पीड़ित को जंजीरों में जकड़ा हुआ पाया और उसे सुरक्षित बचाया।

Why This Matters

BozokMedia analysis shows that this case highlights a critical gap in the historical tracking of fugitives. The fact that a convicted felon could operate a legitimate business as a builder for over two decades underscores the necessity of integrated national biometric databases. It serves as a warning that digital footprints and forensic records eventually catch up with those evading justice.

अमित यादव को 1999 में उम्रकैद की सजा हुई थी, लेकिन जनवरी 2000 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने उसे एक महीने की अंतरिम जमानत दी। जमानत की अवधि समाप्त होने के बाद वह कभी वापस नहीं लौटा। इसके बाद उसने अपनी जड़ों को पूरी तरह काट दिया, अपनी पैतृक संपत्ति बेची और ऋषिकेश होते हुए देहरादून पहुंचा। वहां उसने अपनी पहचान बदलकर निर्माण व्यवसाय (Construction Business) में प्रवेश किया और एक सफल बिल्डर बन गया।

"The use of legacy biometric records to track a fugitive after 26 years demonstrates the evolving power of forensic technology in solving cold cases."

क्राइम ब्रांच के लिए सबसे बड़ी चुनौती यादव की वर्तमान तस्वीर का न होना था। जेल अधिकारियों और पुलिस रिकॉर्ड में उसकी कोई हालिया फोटो उपलब्ध नहीं थी। अंततः, 1999 के समय के बायोमेट्रिक रिकॉर्ड्स और फिंगरप्रिंट ब्यूरो की मदद से उसकी पहचान सुनिश्चित की गई और 13 अगस्त की रात उसे देहरादून से गिरफ्तार कर लिया गया।

क्या आप जानते हैं?: भारत में 'घोषित अपराधी' (Proclaimed Offender) घोषित होने के बाद भी कई अपराधी फर्जी दस्तावेजों के जरिए नए शहरों में अपनी पहचान बदल लेते हैं, जिससे उन्हें ट्रैक करना मुश्किल हो जाता है।

अपराधी का सफर: 1995 बनाम 2026

विवरण1995-20002001-2026
पहचानअपराधी/कैदीप्रतिष्ठित बिल्डर
स्थानदिल्ली/मेरठ/गाजियाबाददेहरादून, उत्तराखंड
कानूनी स्थितिदोषी (उम्रकैद)फरार/लापता

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: अमित यादव को किस मामले में सजा हुई थी?
उसे 1995 में ऋषि सेठी के अपहरण और फिरौती मांगने के मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी।

प्रश्न 2: पुलिस ने उसे इतने सालों बाद कैसे ढूंढा?
क्राइम ब्रांच ने 1999 के पुराने बायोमेट्रिक और फिंगरप्रिंट रिकॉर्ड्स का उपयोग करके उसकी पहचान स्थापित की।