ह्यूमा कुरैशी ने अपने नवीनतम थ्रिलर ‘बेबी डू डाई डू’ में बधिर और मौन हत्यारी की भूमिका के बारे में खुलकर बताया। वह अपने प्रोडक्शन बैनर के तहत ऑफ‑बीट, वास्तविकता‑आधारित फिल्मों को समर्थन देने की अपनी प्रतिबद्धता भी साझा करती हैं।
ह्यूमा कुरैशी ने हाल ही में एक विस्तृत साक्षात्कार में अपने नए थ्रिलर ‘बेबी डू डाई डू’ की कहानी, निर्माण प्रक्रिया और अपने करियर के अगले कदमों पर प्रकाश डाला। यह फिल्म, नचिकेत समंत द्वारा निर्देशित, एक अनोखी कहानी पेश करती है जिसमें ह्यूमा बधिर और मौन हत्यारी की भूमिका में दिखाई देती हैं—एक ऐसा पात्र जो भारतीय सिनेमा में पहले बहुत कम देखा गया है।
फ़िल्म और इसकी असामान्य भूमिका
‘बेबी डू डाई डू’ एक हाई‑ऑक्टेन थ्रिलर है जो शहरी अंडरवर्ल्ड में सेट है, जहाँ मुख्य नायिका एक पेशेवर हत्यारी है जो सुन नहीं सकती और बोल नहीं सकती। ह्यूमा ने इस भूमिका को स्वीकार करने से पहले गहन शोध किया, विशेषकर बधिर समुदाय की भाषा और शारीरिक अभिव्यक्तियों को समझने के लिए। इस प्रकार की भूमिका न केवल अभिनय की सीमाओं को चुनौती देती है, बल्कि दर्शकों को विकलांग व्यक्तियों की जटिलता से परिचित कराती है।
पर्दे के पीछे: उत्पादन और विज़न
फ़िल्म का निर्माण ह्यूमा और उनके भाई साक़िब सलीम के संयुक्त प्रोडक्शन बैनर के तहत हुआ है। ह्यूमा ने बताया कि उनका उद्देश्य केवल बॉक्स‑ऑफ़िस सफलता नहीं, बल्कि ऐसी कहानियों को आगे बढ़ाना है जो मुख्यधारा से हटकर हों। उन्होंने कहा, “हम चाहते हैं कि भारतीय सिनेमा में विविधता और वास्तविकता की आवाज़ें बढ़ें, चाहे वह विषय हो या फ़ॉर्मेट।” इस विचारधारा के तहत, बैनर ने पहले भी ‘गली बॉय’ जैसी इंडी‑फ़िल्में प्रोड्यूस की हैं, जो आलोचनात्मक प्रशंसा प्राप्त कर चुकी हैं।
आगामी प्रोजेक्ट: ‘टॉक्सिक’ में यश और गीता मोहनदास के साथ सहयोग
ह्यूमा ने अपने अगले बड़े प्रोजेक्ट ‘टॉक्सिक’ के बारे में भी चर्चा की, जिसमें यश और निर्देशक गीता मोहनदास के साथ काम किया गया है। यह फिल्म, 26 अगस्त 2026 को रिलीज़ होने वाली, सामाजिक मुद्दों को थ्रिलर शैली में पिरोती है और ह्यूमा की बहु‑परत वाली प्रतिभा को फिर से उजागर करती है। यश के साथ उनका सहयोग पहले ‘हॉट एरियल’ में देखा गया था, और दोनों ने बताया कि इस बार उनका काम अधिक गहरा और चुनौतीपूर्ण है।
उद्योग पर प्रभाव और प्रतिनिधित्व की नई दिशा
ह्यूमा की इस तरह की भूमिकाओं को अपनाने से भारतीय सिनेमा में विविध प्रतिनिधित्व की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। बधिर और मौन किरदारों को नायिका के रूप में पेश करना न केवल सामाजिक जागरूकता बढ़ाता है, बल्कि फिल्म निर्माताओं को भी नई कहानी‑सरणी खोजने के लिए प्रेरित करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अधिक कलाकार इस प्रकार की जोखिमपूर्ण चुनौतियों को अपनाते हैं, तो भारतीय फ़िल्म उद्योग में अंतरराष्ट्रीय मान्यता और आलोचनात्मक प्रशंसा दोनों में वृद्धि होगी।