सरकार द्वारा ईथनॉल उत्पादन के लिए आवंटित 5 लाख मीट्रिक टन चावल का प्रयोग कितना हुआ, और कितना निजी मिलों के माध्यम से गुप्त रूप से हटाया गया, यह पता लगाने के लिए जांच तेज़ चल रही है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • 5 लाख मीट्रिक टन सरकारी चावल के वास्तविक ईथनॉल रूपांतरण पर सवाल
  • 56 मिल और 22 एथेनॉल प्लांट्स को जांच के दायरे में
  • भविष्य में अनियमितताओं को रोकने के लिए नियंत्रण तंत्र की आवश्यकता

भारत सरकार ने जलवायु परिवर्तन को कम करने और इंधन आयात पर निर्भरता घटाने के उद्देश्य से चावल‑आधारित ईथनॉल को प्रमुख बायोफ्यूल बनाना तय किया है। इस नीति के तहत लगभग 5 लाख मीट्रिक टन चावल को ethanol उत्पादन के लिये अलग रख कर, विभिन्न निजी मिलों को सप्लाई किया गया। हाल ही में उजागर हुए बड़े पैमाने के “चावल घोटाले” में यह सवाल उठ रहा है कि इन चावलों में से कितना वास्तविक रूप से ईथनॉल में बदला गया, और कितना निजी मिलों के माध्यम से अनधिकृत रूप से भंडारण या अन्य उद्देश्यों के लिये हटाया गया।

पिछले वर्षों की पृष्ठभूमि

पिछले पाँच वर्षों में भारत ने बायोफ्यूल को ऊर्जा मिश्रण में 5‑10% तक बढ़ाने की योजना बनाई है। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिये राज्य सरकारें और केंद्र ने मिलों को अत्यधिक सब्सिडी दी, जिससे कई छोटे‑मध्यम आकार की मिलें ईथनॉल उत्पादन में भागीदारी करने लगीं। परंतु, निगरानी की कमी और दस्तावेज़ीकरण में असमानता ने कई अनियमितताओं को जन्म दिया, जिनमें चावल के दुरुपयोग की शिकायतें प्रमुख हैं।

जांच के प्रमुख बिंदु

वर्तमान में 56 मिल और 22 एथेनॉल प्लांट्स को केंद्रीय जांच एजेंसियों ने जांच के दायरे में रखा है। एजेंसियों का लक्ष्य तीन मुख्य प्रश्नों के उत्तर खोजना है: (i) आवंटित चावलों में से कितनी मात्रा वास्तविक रूप में ईथनॉल में बदली; (ii) शेष चावल को निजी मिलों द्वारा कितनी बार पुनः सरकारी गोदामों में लौटाया गया; (iii) इस प्रक्रिया में संभावित आर्थिक नुकसान और कर राजस्व की हानि का अनुमान लगाना।

संभावित आर्थिक और सामाजिक प्रभाव

यदि बड़े पैमाने पर चावल का दुरुपयोग सिद्ध होता है, तो यह न केवल सरकारी बजट पर दबाव डालेगा, बल्कि खाद्य सुरक्षा के मुद्दे को भी उठाएगा। 5 लाख मीट्रिक टन चावल का मूल्य लाखों रुपये में है, और इस धनराशि का उचित उपयोग ग्रामीण किसानों की आय में वृद्धि कर सकता था। साथ ही, ईथनॉल उत्पादन में भरोसे की कमी से निवेशकों का विश्वास घट सकता है, जिससे भविष्य के बायोफ्यूल प्रोजेक्टों में देरी हो सकती है।

विशेषज्ञों की राय

अर्थशास्त्री डॉ. रवींद्र सिंह का कहना है, “सभी बड़े बायोफ्यूल योजनाओं में पारदर्शिता और ट्रैकिंग मैकेनिज़्म अनिवार्य हैं। इस तरह की घोटालों से निपटने के लिये डिजिटल लॉजिस्टिक्स और ब्लॉकचेन‑आधारित रिकॉर्ड‑कीपिंग को अपनाना चाहिए।” कृषि विशेषज्ञों ने भी यह बताया कि चावल के उचित उपयोग से न केवल ऊर्जा क्षेत्र बल्कि खाद्य सुरक्षा भी सुनिश्चित हो सकती है।

जांच के परिणामों की प्रतीक्षा करते हुए, सरकार ने कहा है कि यदि कोई भी अनियमितता सिद्ध हुई, तो दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी और भविष्य में इस तरह की घोटालों को रोकने के लिये सख़्त नियम लागू किए जाएंगे।