भारत में खरीफ फसलों के कुल क्षेत्रफल में पिछले शुक्रवार तक 16% की गिरावट दर्ज हुई, जबकि एथेनॉल की बढ़ती मांग के कारण गन्ने की खेती में वृद्धि हुई। दालें, अनाज और तेलहन में सबसे अधिक कमी आई, जिससे किसानों की नकदी फसलों की ओर झुकाव स्पष्ट हुआ।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- कुल खरीफ क्षेत्रफल में 16% की गिरावट
- एथेनॉल मांग के कारण गन्ने का क्षेत्र 57.5 लाख हेक्टेयर तक बढ़ा
- दालें और अनाज में 20% से अधिक की कमी, आय में असमानता बढ़ी
नई दिल्ली: कृषि मंत्रालय ने 10 जुलाई को जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, इस वर्ष खरीफ (गर्मियों में बोई जाने वाली) फसलों का कुल क्षेत्रफल पिछले साल की तुलना में 16% घटा है। यह गिरावट 2025 के समान अवधि के आँकड़ों की तुलना में सबसे बड़ी है, जिससे कृषि उत्पादन की संभावनाओं पर सवाल उठ रहा है।
गन्ने की खेती में एथेनॉल का प्रभाव
इसी बीच, एथेनॉल की बढ़ती मांग के कारण गन्ने की खेती में उल्लेखनीय उछाल देखा गया। 10 जुलाई तक गन्ने की खेती का क्षेत्र 57.5 लाख हेक्टेयर (LHa) रहा, जो पिछले साल के 56.7 LHa और पिछले पाँच वर्षों के औसत 54.2 LHa से अधिक है। सरकार की ई20 (एथेनॉल‑पेट्रोल मिश्रण) नीति ने किसानों को अतिरिक्त आय का स्रोत दिया, जिससे वे इस जल‑गुजली फसल को प्राथमिकता दे रहे हैं।
अन्य फसलों में गिरावट के कारण
दालें, मोटे अनाज (जौ, बाजरा, मक्का), तेलहन, कपास और धान में क्रमशः 23%, 22%, 21%, 15% और 9% की गिरावट दर्ज की गई। इन फसलों की कमी का मुख्य कारण कमजोर मानसून और जल संसाधनों पर बढ़ता दबाव है, जिससे किसान जल‑संचयी फसलों के बजाय नकदी‑फसलों की ओर अधिक झुके हैं।
नकदी फसलों की निरंतर पसंद
बाजार में बेहतर कीमतों की तलाश में किसान गन्ना, जूट और मेस्टा जैसी नकदी फसलों को प्राथमिकता दे रहे हैं। यह प्रवृत्ति न केवल सरकारी एथेनॉल पहलों को समर्थन देती है, बल्कि आयात बिल को भी घटाती है, क्योंकि एथेनॉल के उत्पादन से आयातित पेट्रोल की जरूरत कम होती है। हालांकि, जल‑संकट के चलते दीर्घकालिक स्थिरता पर सवाल उठते हैं; विशेषज्ञ सुझाव दे रहे हैं कि सतत जल‑प्रबंधन और वैकल्पिक फसल प्रौद्योगिकी को प्रोत्साहन देना आवश्यक है।
भविष्य की संभावनाएँ
यदि सरकार जल‑संकट को संबोधित करने के लिए प्रभावी नीतियों को लागू नहीं करती, तो आने वाले वर्षों में खरीफ क्षेत्रफल में और भी गिरावट हो सकती है। साथ ही, एथेनॉल‑उन्मुख गन्ना उत्पादन का विस्तार, यदि सही ढंग से प्रबंधित किया जाए, तो भारत को ऊर्जा सुरक्षा और ग्रामीण आय दोनों में लाभ पहुँचा सकता है।