उत्तर प्रदेश केवल एक्सप्रेसवे और निवेश सम्मेलनों से नहीं, बल्कि अपने 96 लाख MSMEs और कुशल कारीगरों के दम पर औद्योगिक महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है। राज्य सरकार अब कौशल विकास और सामाजिक सुरक्षा के जरिए मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को नई ऊंचाइयों पर ले जा रही है।
मुख्य बातें
- उत्तर प्रदेश में 96 लाख से अधिक MSMEs राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं।
- ODOP योजना के माध्यम से 1.46 लाख से अधिक कारीगरों को प्रशिक्षण मिल चुका है।
- राज्य का निर्यात 2017-18 के 86,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 1.84 लाख करोड़ रुपये हो गया है।
- कानपुर के लेदर क्लस्टर और मुरादाबाद के पीतल उद्योग को विशेष सहायता दी जा रही है।
जब भी उत्तर प्रदेश के औद्योगिक विकास की बात होती है, तो अक्सर चर्चा एक्सप्रेसवे, निवेश सम्मेलनों और नई फैक्ट्रियों के इर्द-गिर्द घूमती है। लेकिन विशेषज्ञों और निर्माताओं का मानना है कि केवल बुनियादी ढांचा (infrastructure) उत्पादन को निरंतर नहीं रख सकता। असली ताकत उन प्रशिक्षित ऑपरेटरों, कुशल कारीगरों और तकनीशियनों में निहित है जो उत्पादन की गुणवत्ता और समय सीमा को बनाए रखते हैं।
MSMEs: उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था का आधार
उत्तर प्रदेश खुद को भारत के प्रमुख मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में स्थापित करने के लिए अपने लगभग 96 लाख सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। ये उद्यम न केवल रोजगार पैदा करते हैं, बल्कि इंजीनियरिंग, खाद्य प्रसंस्करण और हस्तशिल्प जैसे विभिन्न क्षेत्रों में एक विशाल औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र का समर्थन करते हैं।
क्यों यह महत्वपूर्ण है?
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि किसी भी राज्य की प्रतिस्पर्धात्मकता केवल कारखानों की संख्या पर नहीं, बल्कि वहां उपलब्ध कुशल श्रम और स्थानीय उद्यमों की लचीलापन पर निर्भर करती है। उत्तर प्रदेश अब केवल 'उत्पादन' पर नहीं, बल्कि 'कौशल और सुरक्षा' पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।
एक कुशल और सामाजिक रूप से सुरक्षित कार्यबल ही मैन्युफैक्चरिंग क्लस्टरों की उत्पादकता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को बनाए रख सकता है।
कानपुर का चमड़ा उद्योग इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण है। यहाँ के श्रमिकों को अब उद्योग कार्ड के माध्यम से स्वास्थ्य बीमा, डिजिटल पहचान और कौशल विकास कार्यक्रमों से जोड़ा जा रहा है। इसी तरह, 'एक जिला एक उत्पाद' (ODOP) योजना के तहत मुरादाबाद के पीतल उद्योग और मेरठ के खेल सामग्री उद्योग के कारीगरों को ब्रांडिंग, पैकेजिंग और तकनीकी उन्नयन में मदद मिल रही है।
ODOP योजना का प्रभाव: एक तुलनात्मक नज़र
| विशेषता | ODOP से पहले | ODOP के बाद |
|---|---|---|
| निर्यात मूल्य (अनुमानित) | ₹86,000 करोड़ (2017-18) | ₹1.84 लाख करोड़ |
| कारीगर प्रशिक्षण | सीमित पहुंच | 1.46 लाख+ प्रशिक्षित |
| GI टैग्स/पहचान | कम वैश्विक पहचान | 79 GI टैग्स प्राप्त |
ODOP के माध्यम से अब स्थानीय उत्पाद जैसे भदोही के कालीन, कन्नौज के इत्र और वाराणसी की रेशमी साड़ियाँ वैश्विक बाजारों तक पहुंच रही हैं। राज्य ने पारंपरिक उत्पादों की पहचान मजबूत करने के लिए GI टैग्स के लिए आवंटन को 145 करोड़ से बढ़ाकर 200 करोड़ रुपये कर दिया है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. ODOP योजना का मुख्य उद्देश्य क्या है?
इसका उद्देश्य पारंपरिक शिल्प को संरक्षित करना और उन्हें आधुनिक ब्रांडिंग व तकनीक के साथ वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी बनाना है।
2. उत्तर प्रदेश के निर्यात में कितनी वृद्धि हुई है?
राज्य का निर्यात 2017-18 के 86,000 करोड़ रुपये से बढ़कर वर्तमान में 1.84 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।