NEET पेपर लीक के खिलाफ छात्रों के बढ़ते आक्रोश ने महाराष्ट्र के कॉलेजों में तीन दशकों से बंद पड़े छात्र संघ चुनावों की मांग को फिर से जीवित कर दिया है। सरकार और प्रशासन के बीच 'कानून-व्यवस्था' का तर्क अब युवाओं की राजनीतिक अभिव्यक्ति के आड़े आ रहा है।

मुख्य बिंदु

  • महाराष्ट्र के कैंपस में 30 साल से छात्र संघ चुनाव नहीं हुए हैं।
  • 2016 में कानून बना, लेकिन 2019 में विधानसभा चुनावों का हवाला देकर इन्हें टाल दिया गया।
  • 1990 के दशक में कैंपस हिंसा और हत्याओं के कारण चुनावों पर प्रतिबंध लगा था।
  • वर्तमान में NEET विरोध प्रदर्शनों ने छात्रों में राजनीतिक चेतना जगाई है।

मुंबई की सड़कों पर NEET पेपर लीक के खिलाफ हजारों छात्रों का उतरना केवल एक परीक्षा की गड़बड़ी का विरोध नहीं था, बल्कि यह उस दबी हुई राजनीतिक ऊर्जा का विस्फोट था जिसे दशकों से कैंपस से बाहर रखा गया है। विडंबना यह है कि जो युवा आज सड़कों पर जवाबदेही मांग रहे हैं, उनमें से अधिकांश ने अपने कॉलेज कैंपस में कभी किसी प्रतिनिधि के लिए वोट नहीं डाला है।

महाराष्ट्र में छात्र संघ चुनावों का इतिहास रक्तरंजित रहा है। 1989 में NSUI नेता ओवेन डी'सूजा की हत्या के बाद, सार्वजनिक आक्रोश बढ़ा और अंततः 1994 के महाराष्ट्र विश्वविद्यालय अधिनियम के माध्यम से प्रत्यक्ष प्रतिस्पर्धी चुनावों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। तब से, 'कानून और व्यवस्था' को ढाल बनाकर इन चुनावों को दूर रखा गया है।

यह क्यों महत्वपूर्ण है

BozokMedia के विश्लेषण के अनुसार, छात्र संघ चुनाव केवल पद पाने का जरिया नहीं, बल्कि नेतृत्व क्षमता विकसित करने की नर्सरी होते हैं। राज्य के वर्तमान कई मंत्री स्वयं छात्र आंदोलनों से निकलकर आए हैं, लेकिन आज की पीढ़ी (Gen Z) को वह मंच नहीं मिल रहा है। जब कैंपस में लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं खत्म हो जाती हैं, तो असंतोष सड़कों पर हिंसक या अनियंत्रित रूप में प्रकट होता है।

"यदि केवल कानून-व्यवस्था ही चिंता है, तो इसी तर्क से महाराष्ट्र या पूरे देश में कोई भी चुनाव नहीं होना चाहिए।" - दीपक पवार, राजनीति विज्ञान प्रोफेसर, मुंबई विश्वविद्यालय।

2016 में सरकार ने इन चुनावों को बहाल करने का कानून बनाया था। 2019 में चुनाव होने ही वाले थे कि कैबिनेट ने उन्हें स्थगित कर दिया। तब से अब तक सरकार का रुख यह रहा है कि 'किसी ने मांग ही नहीं की'। लेकिन अब CJP, NSUI और प्रोग्रेसिव स्टूडेंट्स यूनियन जैसे संगठन फिर से इस मुद्दे को गरमा रहे हैं।

क्या आप जानते हैं?: 2005 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर 'लिंगदोह समिति' का गठन किया गया था, ताकि छात्र चुनावों में धन और बाहुबल के प्रभाव को कम किया जा सके।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: महाराष्ट्र में छात्र चुनाव कब से बंद हैं?
उत्तर: कैंपस में हिंसा और 1989 की एक हत्या के बाद, 1994 के अधिनियम के माध्यम से इन्हें प्रभावी रूप से बंद कर दिया गया था।

प्रश्न 2: 2019 में चुनाव क्यों नहीं हुए?
उत्तर: सरकार ने विधानसभा चुनाव के आचार संहिता और कानून-व्यवस्था का हवाला देते हुए इन्हें स्थगित कर दिया था।