दिल्ली पुलिस ने एक बड़े ऑनलाइन गोद लेने के रैकेट का पर्दाफाश किया है, जहाँ फर्जी वेबसाइट और जाली दस्तावेजों के जरिए मासूम बच्चों के नाम पर परिवारों से लाखों रुपये ठगे गए। इस गिरोह ने अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट और एनजीओ की रसीदें तक फर्जी बनाई थीं।
मुख्य बातें
- ठगों ने फर्जी वेबसाइट बनाकर कानूनी गोद लेने की सेवाएं देने का झांसा दिया।
- जाली अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट और एनजीओ रसीदों का उपयोग विश्वास जीतने के लिए किया गया।
- दिल्ली पुलिस ने बरेली (यूपी) से दो आरोपियों, सचिन अग्रवाल और राकेश कुमार को गिरफ्तार किया है।
- पीड़ितों से 'रजिस्ट्रेशन' और 'ट्रांसपोर्टेशन' के नाम पर लाखों रुपये वसूले गए।
दिल्ली के उत्तरी जिले से एक दिल दहला देने वाला मामला सामने आया है, जहाँ एक सोची-समझी साजिश के तहत डिजिटल माध्यमों का उपयोग करके माता-पिता बनने की चाह रखने वाले परिवारों को निशाना बनाया गया। पुलिस जांच के अनुसार, आरोपियों ने एक पेशेवर दिखने वाली वेबसाइट बनाई थी, जो कानूनी रूप से बच्चे गोद लेने में मदद करने का दावा करती थी।
एक पीड़िता, अर्चना (नाम बदला हुआ), जो उत्तर दिल्ली के बुराड़ी की रहने वाली हैं, इस जाल में फंस गईं। उन्होंने सालों तक एक बेटे की चाहत में IVF और सरोगेसी जैसे कई प्रयास किए थे। जब उन्होंने इंटरनेट पर विज्ञापन देखा, तो उन्हें लगा कि उन्हें अपनी मंजिल मिल गई है। आरोपी सचिन अग्रवाल ने खुद को एक संस्था का प्रतिनिधि बताया और एक काल्पनिक डिलीवरी की तारीख भी दी।
यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है?
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह केवल एक साधारण धोखाधड़ी नहीं है, बल्कि मानवीय भावनाओं और माता-पिता बनने की गहरी इच्छा का फायदा उठाने वाला एक सुनियोजित अपराध है। जालसाजों ने मनोवैज्ञानिक रूप से पीड़ितों को नियंत्रित करने के लिए उन्हें बच्चे के कपड़े खरीदने तक के लिए प्रेरित किया, ताकि वे इस फर्जी प्रक्रिया को पूरी तरह से सच मान लें।
डिजिटल युग में, केवल वेबसाइट का पेशेवर दिखना ही उसकी विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है; दस्तावेजों की भौतिक जांच अनिवार्य है।
जांच में पाया गया कि इस रैकेट में एक फिजियोथेरेपिस्ट, राकेश कुमार, भी शामिल था। वह अस्पतालों में जाकर गर्भवती महिलाओं की असली अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट प्राप्त करता था और उनमें नाम बदलकर फर्जी दस्तावेज तैयार करता था। इन दस्तावेजों का उपयोग पीड़ितों का भरोसा जीतने के लिए किया जाता था।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
पिछले कुछ वर्षों में, साइबर अपराधों में 'सोशल इंजीनियरिंग' का उपयोग बढ़ गया है, जहाँ अपराधी लोगों की भावनाओं (जैसे गोद लेना या चिकित्सा सहायता) को निशाना बनाते हैं। दिल्ली पुलिस अब इस बात की जांच कर रही है कि क्या इस गिरोह ने देश के अन्य हिस्सों में भी अन्य परिवारों को अपना शिकार बनाया है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. यह धोखाधड़ी कैसे काम करती थी?
अपराधी फर्जी वेबसाइट बनाते थे और फिर जाली मेडिकल रिपोर्ट और रसीदें भेजकर लोगों को विश्वास दिलाते थे कि प्रक्रिया कानूनी है।
2. पुलिस ने अब तक क्या कार्रवाई की है?
दिल्ली पुलिस ने बरेली से दो मुख्य आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है और उनके डिजिटल फुटप्रिंट्स की जांच कर रही है।