पुणे में साइबर अपराधियों ने फर्जी पुलिस अधिकारी बनकर एक सेवानिवृत्त बैंकर को 'डिजिटल अरेस्ट' के जाल में फंसाया और आतंकी फंडिंग के नाम पर 1.05 करोड़ रुपये ठग लिए।

मुख्य बातें

  • 72 वर्षीय सेवानिवृत्त बैंकर को चार दिनों तक 'डिजिटल अरेस्ट' में रखा गया।
  • अपराधी पुलिस, RBI, ED और सुप्रीम कोर्ट के नाम का इस्तेमाल कर रहे थे।
  • पीड़ित ने बैंक खातों के 'सत्यापन' के नाम पर 1.05 करोड़ रुपये ट्रांसफर किए।
  • धोखाधड़ी का खुलासा तब हुआ जब अपराधियों ने पहचान पत्र दिखाने से मना कर दिया।

पुणे: साइबर अपराधियों ने एक बेहद शातिर तरीके से एक 72 वर्षीय सेवानिवृत्त बैंकर को अपना शिकार बनाया है। अपराधियों ने खुद को मुंबई पुलिस, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI), प्रवर्तन निदेशालय (ED) और सुप्रीम कोर्ट के अधिकारी बताकर पीड़ित को आतंकित किया और अंततः उनसे 1.05 करोड़ रुपये हड़प लिए।

पुणे साइबर पुलिस ने इस मामले में प्राथमिकी (FIR) दर्ज कर ली है। जांच में पता चला है कि यह एक सोची-समझी 'डिजिटल अरेस्ट' की साजिश थी, जिसमें पीड़ित को चार दिनों तक मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया। अपराधियों ने फर्जी सरकारी लेटरहेड वाले दस्तावेज भेजकर पीड़ित को विश्वास दिलाया कि वह मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकी फंडिंग के एक बड़े मामले में शामिल है।

यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है?

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि साइबर अपराधी अब वरिष्ठ नागरिकों को निशाना बना रहे हैं, क्योंकि वे सरकारी प्रक्रियाओं से परिचित होते हैं लेकिन डिजिटल खतरों के प्रति संवेदनशील हो सकते हैं। अपराधियों ने पीड़ित को यह कहकर भरोसा दिलाया कि एक पूर्व सरकारी कर्मचारी होने के नाते, जांच में सहयोग करने पर अधिकारी उन्हें 'सुरक्षा' प्रदान करेंगे।

डिजिटल अरेस्ट एक उभरता हुआ खतरा है जहाँ अपराधी वीडियो कॉल के माध्यम से पीड़ित को मनोवैज्ञानिक रूप से बंधक बना लेते हैं।

धोखाधड़ी की शुरुआत 25 जुलाई को एक कॉल से हुई, जिसमें दावा किया गया कि पीड़ित का आधार और डेबिट कार्ड मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ा है। इसके बाद, एक व्हाट्सएप वीडियो कॉल के माध्यम से अपराधी ने राष्ट्रीय ध्वज और महाराष्ट्र पुलिस के प्रतीक चिन्ह के सामने बैठकर खुद को कोलाबा पुलिस स्टेशन का अधिकारी बताया।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: डिजिटल अरेस्ट का बढ़ता चलन

पिछले कुछ महीनों में, भारत के विभिन्न हिस्सों में 'डिजिटल अरेस्ट' के मामलों में भारी वृद्धि देखी गई है। इस प्रकार के घोटाले में, अपराधी कानून प्रवर्तन एजेंसियों का रूप धारण करते हैं और पीड़ित को तब तक वीडियो कॉल पर रहने के लिए मजबूर करते हैं जब तक कि वे पैसे नहीं मांग लेते।

क्या आप जानते हैं?: कोई भी सरकारी एजेंसी कभी भी वीडियो कॉल के माध्यम से किसी व्यक्ति को 'अरेस्ट' नहीं करती है और न ही पैसे की मांग करती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. डिजिटल अरेस्ट क्या है? यह एक साइबर अपराध है जहाँ अपराधी पुलिस या अन्य एजेंसी बनकर पीड़ित को वीडियो कॉल पर डराते हैं और उन्हें 'गिरफ्तारी' का डर दिखाकर पैसे वसूलते हैं।

2. अगर मेरे साथ ऐसा हो तो क्या करें? तुरंत 1930 पर कॉल करें या www.cybercrime.gov.in पर अपनी शिकायत दर्ज करें।