पिछले साल में लगभग 4,800 स्कूल बंद हुए, जबकि छात्र प्रवेश में 2.9 लाख की वृद्धि दर्ज हुई। यह असमानता विभिन्न राज्यों में अलग‑अलग रूप से प्रकट हुई, जिससे शिक्षा नीति पर सवाल उठते हैं।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- 2025‑26 में भारत में स्कूलों की कुल संख्या 14.66 लाख तक घटी
- समान अवधि में छात्र प्रवेश 2.9 लाख बढ़ा
- मेघालय, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल में स्कूल‑प्रति छात्र संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि
राष्ट्रीय स्तर पर, शिक्षा मंत्रालय के नवीनतम UDISE+ रिपोर्ट ने एक विरोधाभासी चित्र पेश किया है: स्कूलों की संख्या घटते‑घटते 14.71 लाख से 14.66 लाख तक आती है, जबकि छात्र प्रवेश में 2.9 लाख की वृद्धि हुई। यह आँकड़ा दर्शाता है कि भले ही संस्थानों की संख्या घट रही हो, शैक्षणिक मांग में कोई कमी नहीं आई।
राज्यवार असंतुलन
पंद्रह राज्य‑और‑केंद्र शासित प्रदेशों में स्कूलों की संख्या घटने के साथ‑साथ छात्र प्रवेश में वृद्धि देखी गई। सबसे तीव्र असंतुलन मेघालय में दर्ज किया गया, जहाँ स्कूलों की संख्या 21.4% घटने के बावजूद छात्र प्रवेश 4.5% बढ़ा, जिससे औसत छात्रों की संख्या प्रति स्कूल 73 से 97 तक बढ़ गई। तेलंगाना में स्कूल‑प्रति छात्र संख्या 173 से 184 तक बढ़ी, जबकि पश्चिम बंगाल में 0.6% स्कूल गिरावट के बावजूद प्रवेश 3.8% बढ़ा।
विपरीत प्रवृत्ति वाले क्षेत्र
दूसरी ओर, ग्यारह राज्य‑और‑केंद्र शासित प्रदेशों में स्कूलों की संख्या बढ़ी, जबकि छात्र प्रवेश घटा। दिल्ली ने 1.6% स्कूल वृद्धि के साथ 1% प्रवेश गिरावट दर्ज की, जिससे औसत छात्रों की संख्या 808 से 788 तक घट गई। बिहार, राजस्थान, पुडुचेरी, चंडीगढ़ और उत्तर प्रदेश ने भी इसी तरह की प्रवृत्ति दर्शायी।
ऐतिहासिक और नीति‑परिप्रेक्ष्य
भारत में पिछले दो दशकों में शिक्षा विस्तार का लक्ष्य रहा है, परंतु यह आँकड़े दिखाते हैं कि बुनियादी बुनियादी ढाँचे का विस्तार हमेशा छात्र मांग के साथ तालमेल नहीं बिठा पाता। पूर्वी उत्तर प्रदेश और मध्य भारत में स्कूल बंद होने के पीछे अक्सर वित्तीय प्रतिबंध, शिक्षक अभाव या अनुचित अभिलेखीय प्रबंधन का कारण माना जाता है। इसके विपरीत, शहरी क्षेत्रों में नई स्कूलों की स्थापना अधिक होती है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में मौजूदा संस्थानों को बंद किया जाता है।
भविष्य की संभावनाएँ
यदि इस असंतुलन को सही समय पर नहीं सुधारा गया, तो शैक्षणिक गुणवत्ता में गिरावट, छात्र‑पर‑स्कूल अनुपात में वृद्धि और अंततः सामाजिक असमानता बढ़ सकती है। नीति निर्माताओं को चाहिए कि वे स्कूल बंद होने के कारणों की जाँच कर, पुनःस्थापना या पुनर्निर्माण के लिए लक्षित निधि आवंटित करें, साथ ही डिजिटल शिक्षा के माध्यम से दूरस्थ क्षेत्रों में पहुँच सुनिश्चित करें।