रियलिटी टेलीविजन स्टार प्रिंस नरूला ने अपने गंभीर anxiety के दौर का खुलासा किया, जिसमें उन्होंने एक दिन में 18 दवाइयाँ लीं और सोने से भी डरते रहे। उनकी पत्नी युविका चौधरी ने भी इस कठिन समय में परिवार को संभालने की अपनी भावनात्मक कहानी साझा की।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- प्रिंस नरूला ने 18 दवाइयाँ रोज़ लीं, सोने से डरते थे
- तीन महीने तक नींद न रहने से शारीरिक स्वास्थ्य बिगड़ा
- संगीत और परिवार की समर्थन से धीरे‑धीरे सुधार
रियलिटी शो के लोकप्रिय चेहरा प्रिंस नरूला ने हाल ही में डबल डेट विद नेहा धुपिया एंड अंगद बेदी में अपनी मानसिक स्वास्थ्य की जंग के बारे में खुलकर बात की। वह बताते हैं कि एक तीव्र anxiety के दौर में उन्हें रातों‑रात नींद न आने लगी और सोते‑सोते मरने का डर सताता रहा। यह खुलासा इस बात को उजागर करता है कि सफल करियर, वित्तीय स्थिरता और मजबूत रिश्ते के बावजूद भी मानसिक बीमारियां अचानक उभर सकती हैं।
भय और दवाओं का चक्र
नरूला ने बताया कि anxiety ने उन्हें लगातार पैनिक अटैक, हृदय की धड़कन तेज़ हो जाना और कभी‑कभी गाड़ी बीच में छोड़कर चल देना जैसी स्थितियों में डाल दिया। “छह महीनों तक मैं रात में नहीं सो पाता था, रात खुद ही डरावनी लगने लगी,” वह कहते हैं। इस निरंतर तनाव ने उनके कोलेस्ट्रॉल को बढ़ा दिया, लिवर थकान पैदा की और कई अन्य शारीरिक समस्याएं उत्पन्न हुईं। “एक समय ऐसा था जब मैं रोज़ 18 टैबलेट ले रहा था,” उन्होंने कहा।
परिवार का समर्थन और वास्तविक चुनौतियां
उनकी पत्नी युविका चौधरी ने इस दौर में अपने संघर्ष को आँसूओं के साथ बताया। वह कहती हैं कि जब प्रिंस का स्वास्थ्य बिगड़ रहा था, तो उन्हें चंडीगढ़ में उनका समर्थन करने के लिए तुरंत जाना पड़ा। “उसका वजन 20 किलोग्राम तक गिर गया, चेहरा बेजान हो गया। वह एक संदेश भेजा, ‘मैं बहुत बुरा हूँ, अब और नहीं सह सकता,’” युविका ने याद किया। वह इस बात पर भी ज़ोर देती हैं कि सबसे बड़ी चुनौती थी उनकी बेटी इकलीन को इस तनाव का असर न पड़ने देना।
संगीत का उपचारात्मक प्रभाव
नरूला ने बताया कि संगीत ही उनका सबसे बड़ा सहारा रहा है। “जब भी anxiety वापस आती है, मैं स्टूडियो में जाता हूँ, गाने बनाता हूँ; यह मेरा मन शांत करता है,” उन्होंने कहा। इस संगीत थेरेपी ने न केवल उन्हें शारीरिक रूप से बल्कि भावनात्मक रूप से भी स्थिर किया।
भविष्य की दिशा
अब प्रिंस और युविका दोनों मानते हैं कि उनका धैर्य, पारिवारिक समर्थन और पेशेवर मदद ने उन्हें इस अंधेरे दौर से बाहर निकाला है। वे चाहते हैं कि समाज में मानसिक स्वास्थ्य के बारे में जागरूकता बढ़े, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में जहाँ “anxiety” शब्द ही अज्ञात हो सकता है।