छत्तीसगढ़ सरकार ने बारिश की अनिश्चितता, जल तनाव और श्रम की कमी को देखते हुए सीधे बीज से धान उगाने (DSR) को प्राथमिकता दी है। इस लेख में DSR के लाभ, चुनौतियों और राज्य में अपनाने की वर्तमान स्थिति का विस्तृत विश्लेषण किया गया है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • DSR विधि से जल उपयोग में लगभग 20% कमी आती है।
  • प्रति एकड़ लागत लगभग ₹5,000 घटती है और फसल 12‑15 दिन पहले तैयार होती है।
  • भूजल स्तर घटने, श्रम कमी और जलवायु अनिश्चितता के कारण DSR अपनाना आवश्यक है।

छत्तीसगढ़ सरकार ने 3 जुलाई 2026 को जारी किए गए एक विशेष परामर्श में धान की पारंपरिक रोपण विधि के बजाय डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) को प्राथमिकता देने का निर्देश दिया। यह कदम एली नीनो‑प्रेरित कमजोर मॉनसून, बढ़ते जल तनाव और श्रम की कमी जैसे कई मौसमी चुनौतियों के जवाब में लिया गया है।

डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) क्या है?

DSR में बीज को सीधे खेत की मिट्टी में हाथ से या आधुनिक बीज ड्रिल मशीनों की मदद से बोया जाता है। प्राचीन समय में, जब नहर और बोरवेल जैसी सिंचाई सुविधाएँ नहीं थीं, किसान इस विधि से ही धान उगाते थे। हालांकि, प्रारम्भिक चरण में खरपतवार नियंत्रण की समस्या ने इस पद्धति को सीमित कर दिया। ग्रीन रिवॉल्यूशन के बाद, जल आपूर्ति की गारंटी के साथ रोपण‑आधारित खेती ने प्रमुखता हासिल की, जिससे खरपतवार नियंत्रण आसान हो गया।

DSR के प्रमुख लाभ

सरकारी परामर्श के अनुसार, DSR से जल उपयोग में लगभग 20% बचत होती है, जबकि परंपरागत रोपण विधि में 1 किलोग्राम धान उत्पादन के लिए 2,500‑3,000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। आर्थिक दृष्टि से, इस पद्धति से प्रति एकड़ लगभग ₹5,000 की लागत घटती है और फसल 12‑15 दिन पहले तैयार हो जाती है, जिससे किसान जल्दी से बाजार में प्रवेश कर सकते हैं। इसके अलावा, नई पीढ़ी के बीज ड्रिल और ट्रैक्टरों ने अंतर‑पंक्ति दूरी को सटीक रखने में मदद की है, जबकि हर्बिसाइड‑टॉलरेंट धान की किस्में खरपतवार प्रबंधन को सरल बनाती हैं।

समस्याएँ और चुनौतियाँ

भले ही DSR के लाभ स्पष्ट हैं, इसे अपनाने में कई बाधाएँ हैं। खरपतवार नियंत्रण अभी भी प्रमुख चुनौती बना हुआ है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ जल की कमी के कारण फसल को सतह पर नहीं रखा जा सकता। उपकरणों की शुरुआती लागत—जैसे सुपर बीज ड्रिल—लगभग ₹1.5 लाख तक पहुँच सकती है, जिससे छोटे किसानों के लिए वित्तीय बोझ बढ़ जाता है। साथ ही, छत्तीसगढ़ में कृषि श्रमिकों की कमी और बढ़ती भूजल गिरावट ने किसानों को वैकल्पिक तकनीकों की ओर धकेल दिया है, लेकिन प्रशिक्षित कर्मियों की उपलब्धता अभी सीमित है।

छत्तीसगढ़ में अपनाने की वर्तमान स्थिति

राज्य ने पिछले खरीफ़ में 141 लाख मीटर टन धान का खरीद किया, जिससे यह देश के प्रमुख धान उत्पादकों में से एक बन गया। कुल 25.24 लाख पंजीकृत किसान हैं, जिनमें से आधे से अधिक सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर हैं। हालांकि, पंजाब और हरियाणा जैसी राज्यों की तुलना में छत्तीसगढ़ में DSR की पैठ अभी कम है, क्योंकि यहाँ के अधिकांश क्षेत्र—विशेषकर महनाड़ी बेसिन—बारिश पर निर्भर हैं और सिंचाई सुविधाएँ 75% से अधिक खेतों तक नहीं पहुँच पातीं।

भविष्य का मार्ग

जलवायु परिवर्तन के तेज़ी से बढ़ते प्रभाव को देखते हुए, DSR को व्यापक स्तर पर अपनाना न केवल जल संरक्षण बल्कि सतत कृषि के लिए भी आवश्यक होगा। राज्य को चाहिए कि वह बीज ड्रिल जैसे महंगे उपकरणों को किराये पर उपलब्ध कराए, सब्सिडी के माध्यम से शुरुआती लागत घटाए और किसानों को आधुनिक हर्बिसाइड‑टॉलरेंट किस्मों के बारे में जागरूक करे। ऐसी नीतियों से न केवल उत्पादन लागत घटेगी, बल्कि धान की खेती से उत्पन्न मीथेन गैस की मात्रा भी कम होगी, जो भारत की कुल हरितगृह गैस उत्सर्जन में महत्वपूर्ण योगदान देती है।