तेलंगाना के 32 ग्रामीण जिलों में 63% मंडलों में भारी कमी वाली वर्षा दर्ज की गई है, जिससे जलाशयों का स्तर घटा है और खरीफ फसल की पैदावार पर गंभीर असर पड़ेगा। मौसम विभाग के अनुमान के अनुसार जुलाई के शेष भाग में भी बारिश कम ही होगी।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • तेलंगाना के 63% मंडल में भारी वर्षा कमी
  • मुख्य जलाशयों में जलस्तर घटा, सिंचाई पर दबाव
  • कृषि विभाग वैकल्पिक बीज वितरण की तैयारी कर रहा है

जुलाई के पहले सप्ताह में खरीफ फसलों की कुल सिचाई क्षेत्रफल पिछले साल की तुलना में अधिक होने के बावजूद, तेलंगाना में मौसमी संकट ने फसल के भविष्य को अनिश्चित बना दिया है। राज्य के 32 ग्रामीण जिलों में 605 में से 382 मंडल अब भारी या मध्यम वर्षा कमी का सामना कर रहे हैं, जिससे जल संसाधनों पर दबाव बढ़ गया है।

वर्षा कमी की विस्तृत तस्वीर

तेलंगाना विकास नियोजन समाज द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, 68 मंडलों में ‘बड़ी कमी’ (60‑99% कम) दर्ज हुई, जबकि 327 मंडलों में ‘कमी’ (20‑59% कम) हुई। केवल 45 मंडलों में ‘अधिक वर्षा’ दर्ज की गई, जो अधिकांशतः रांगरेड्डी, नलगोंडा और नागरकुर्नूल जैसे जिलों में केंद्रित है। औसत वास्तविक वर्षा सामान्य से 25% कम रही, जिससे जल निकायों के जलस्तर में उल्लेखनीय गिरावट आई।

सिंचाई और जलाशयों की स्थिति

मुख्य, मध्यम और छोटे जलाशयों में जल स्तर निचले स्तर पर है, क्योंकि वर्षा के अभाव ने इनके जलसंकलन क्षेत्र को खाली कर दिया है। इससे किसानियों को न सिर्फ खरीफ फसलों की बुवाई में कठिनाई, बल्कि अगली रबी फसल के लिए भी जल उपलब्धता पर प्रश्न उठ रहा है। पिछले वर्ष की तुलना में इस जून में जलस्रोतों का औसत स्तर 9.46 मीटर नीचे था, जबकि पिछले साल 9.47 मीटर रहा।

फसल पैटर्न और संभावित जोखिम

राज्य में अब तक 39.44 लाख एकड़ कपास, 4.22 लाख एकड़ धान, 3.35 लाख एकड़ सोयाबीन, 3.19 लाख एकड़ मूंग, 2.84 लाख एकड़ मक्का और 46,000 एकड़ हरित और काली दालें बोई गई हैं। हालांकि, यदि जुलाई के शेष भाग में भी बारिश नहीं हुई, तो इन फसलों की पैदावार में गंभीर गिरावट की संभावना है, जिससे किसानों की आय और राज्य की कृषि उत्पादन पर लंबी अवधि का असर पड़ेगा।

प्रतिक्रिया एवं आकस्मिक योजना

कृषि विभाग ने संभावित वर्षा की कमी को देखते हुए वैकल्पिक फसलों के बीज उपलब्ध कराने की तैयारी शुरू कर दी है। इससे किसानों को जल-सहिष्णु फसलों की ओर बदलने का अवसर मिलेगा, जिससे जल संकट के बावजूद उत्पादन को स्थिर रखा जा सकेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इस वर्ष के मौसमी परिदृश्य को देखते हुए जल प्रबंधन, जल संरक्षण और जल-संवेदनशील फसलों की प्रोत्साहन नीतियों को सुदृढ़ करना आवश्यक होगा।