डुबई के एक क्लिनिक ने वार्षिक ट्यूमर मार्कर परीक्षण को स्वास्थ्य जांच में शामिल करने का प्रस्ताव रखा, परंतु इस क्षेत्र के विशेषज्ञों ने बताया कि ये परीक्षण सामान्य जनसंख्या में कैंसर स्क्रीनिंग के लिये उपयुक्त नहीं हैं। ट्यूमर मार्कर का सही उपयोग केवल निदान‑पश्चात निगरानी में ही होता है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- ट्यूमर मार्कर सामान्य स्वास्थ्य जांच में कैंसर स्क्रीनिंग नहीं हैं।
- इनका मुख्य उपयोग कैंसर की निगरानी, उपचार प्रतिक्रिया और पुनरावृत्ति में होता है।
- गलत उपयोग से फॉल्स‑पॉजिटिव, अनावश्यक जांच और तनाव बढ़ सकता है।
एक दुबई‑स्थित लोंजवियम क्लिनिक ने हाल ही में वार्षिक ट्यूमर मार्कर परीक्षण—जैसे CEA, CA‑125, AFP, CA 19‑9 और PSA—को सामान्य स्वास्थ्य जांच में शामिल करने का सुझाव दिया। हालांकि, कई अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य दिशानिर्देश और भारतीय कैंसर विशेषज्ञों का मानना है कि ये रक्त‑जाँचें स्वस्थ वयस्कों में कैंसर स्क्रीनिंग के लिये नहीं रखी गई हैं। थाने के KIMS हॉस्पिटल में GI & HPB ऑनकोसर्जरी की कंसल्टेंट डॉ. सनेया पांडरोवाला ने स्पष्ट किया कि बिना लक्षण या उच्च पारिवारिक जोखिम के नियमित ट्यूमर मार्कर परीक्षण की अनुशंसा नहीं की जाती।
वैश्विक दिशानिर्देश और स्क्रीनिंग की सीमाएँ
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और प्रमुख राष्ट्रीय कैंसर संस्थानों की रिपोर्टें इस बात पर ज़ोर देती हैं कि ट्यूमर मार्कर को सार्वभौमिक कैंसर‑स्क्रीनिंग टूल के रूप में उपयोग करने से कैंसर‑संबंधी मृत्यु दर में कमी नहीं दिखी। उनका तर्क है कि प्रभावी स्क्रीनिंग तभी काम करती है जब वह लक्षित समूहों—जैसे स्तन कैंसर के लिये मैमोग्राफी, गर्भाशय ग्रीवा कैंसर के लिये पाप स्मीयर, और कोलोरेक्टल कैंसर के लिये कोलोनोस्कोपी—के लिये विशिष्ट हो। ट्यूमर मार्कर इन लक्षित कार्यक्रमों का विकल्प नहीं हैं।
ट्यूमर मार्कर का वास्तविक उपयोग
ट्यूमर मार्कर का प्रमुख कार्य तब सामने आता है जब रोगी को पहले से कैंसर का निदान हो चुका हो। यह उपचार की प्रभावशीलता को मापने, रोग की प्रगति या पुनरावृत्ति का पता लगाने में मदद करता है। उदाहरण के लिये, CEA कोलोरेक्टल कैंसर में बढ़ सकता है, CA‑125 ओवरी कैंसर से जुड़ा होता है, AFP यकृत कैंसर या जर्म‑सेल ट्यूमर में बढ़ता है, CA 19‑9 पैंक्रियाटिक तथा बिलियरी कैंसर में बढ़ सकता है, और PSA प्रोस्टेट रोगों के संकेतक के रूप में कार्य करता है।
गैर‑कैंसर स्थितियों में भी बढ़े स्तर
इन मार्करों के स्तर कई गैर‑कैंसर परिस्थितियों में भी बढ़ सकते हैं—जैसे संक्रमण, सूजन, यकृत रोग, pancreatitis, एंडोमीट्रियोसिस, और यहाँ तक कि धूम्रपान (CEA के लिये)। इसलिए एक सामान्य स्तर का अर्थ यह नहीं कि कैंसर नहीं है, जबकि उच्च स्तर जरूरी नहीं कि कैंसर की पुष्टि करे। गलतफहमी से फॉल्स‑पॉजिटिव परिणाम तनाव, अतिरिक्त इमेजिंग, और कभी‑कभी अनावश्यक बायोप्सी का कारण बन सकते हैं, जबकि फॉल्स‑नेगेटिव परिणाम देर से निदान का जोखिम बढ़ा देते हैं।
कौन करवा सकता है ट्यूमर मार्कर परीक्षण?
डॉ. पांडरोवाला का मानना है कि ये परीक्षण केवल तब आदेशित होने चाहिए जब चिकित्सीय कारण स्पष्ट हो—जैसे ज्ञात कैंसर रोगी, या लक्षण, शारीरिक परीक्षा या इमेजिंग के आधार पर किसी विशेष malignancy का संदेह हो। उच्च‑जोखिम समूह—जैसे क्रॉनिक लिवर रोग वाले, विरासत में कैंसर सिंड्रोम वाले, या परिवार में कई कैंसर मामलों वाले लोग—को विशेष मार्कर का चयनित परीक्षण एक व्यापक निगरानी योजना के हिस्से के रूप में किया जा सकता है, परन्तु यह हमेशा अन्य नैदानिक डेटा के साथ संयोजित होना चाहिए।
निष्कर्ष
ट्यूमर मार्कर रक्त‑जाँचें कैंसर देखभाल में एक महत्वपूर्ण उपकरण हैं, परन्तु उन्हें सामान्य जनसंख्या में वार्षिक स्क्रीनिंग के विकल्प के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। स्वास्थ्य‑सेवा पेशेवरों को इस बात पर ज़ोर देना चाहिए कि प्रमाण‑आधारित स्क्रीनिंग कार्यक्रमों का पालन किया जाए और ट्यूमर मार्कर को केवल सहायक निदान उपकरण के रूप में उपयोग किया जाए।