राजस्थान के सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली पर कड़ी नज़र है, जहाँ पिछले छह दिनों में नौ महिलाओं की मौतें हुईं और मई से कुल 18 मातृ मौतें दर्ज हुईं। भिलवाड़ा और बांसवाड़ा के अस्पतालों में हुई इन घटनाओं की जांच विशेषज्ञ टीमों द्वारा की जा रही है, जबकि परिवार जवाबदेही और सुधार की मांग कर रहे हैं।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- राजस्थान में हाल ही में 18 मातृ मौतें दर्ज
- भिलवाड़ा और बांसवाड़ा में नौ महिलाओं की मौतें
- सार्वजनिक अस्पतालों में रोगी सुरक्षा पर प्रश्न उठे
राजस्थान के सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग को एक गंभीर परीक्षण का सामना करना पड़ रहा है, जहाँ पिछले छह दिनों में सरकारी अस्पतालों में नौ महिलाएँ प्रसव या प्रसवोत्तर जटिलताओं के कारण मृत्युदंड हुईं। इस हफ्ते ही भिलवाड़ा और बांसवाड़ा जिलों में दो अलग-अलग अस्पतालों में ये मौतें हुईं, जिससे स्थानीय समुदाय में शोक और गुस्सा दोनों ही बढ़ गया है।
पृष्ठभूमि
भारत में मातृ मृत्यु दर (MMR) राष्ट्रीय स्तर पर धीरे-धीरे घट रही है, लेकिन कई राज्यों में अभी भी असमानताएँ स्पष्ट हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आंकड़ों के अनुसार, भारत में 100,000 जीवित जन्मों पर 113 माताओं की मृत्यु दर्ज की गई है, जबकि राजस्थान के आँकड़े राष्ट्रीय औसत से अधिक हैं। यह अंतर अक्सर ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, प्रशिक्षित कर्मियों की कमी और आपातकालीन देखभाल में देरी से जुड़ा होता है।
राजस्थान में स्थितियों की जांच
राज्य सरकार ने इस मामले में तुरंत एक विशेष जांच टीम गठित की है, जिसमें प्रसव विशेषज्ञ, सार्वजनिक स्वास्थ्य वैज्ञानिक और कानूनी सलाहकार शामिल हैं। टीम ने मृतकों के मेडिकल रिकॉर्ड, अस्पताल के स्टाफ शिफ्ट, और आपूर्ति श्रृंखला की गहन समीक्षा शुरू कर दी है। प्रारम्भिक रिपोर्ट से पता चलता है कि कई मामलों में रक्तस्राव, संक्रमण और समय पर एंटीबायोटिक उपचार की कमी प्रमुख कारणों में शामिल थीं।
अन्य राज्यों की तुलना
मुम्बई में भी उच्च जोखिम वाले रेफरल मामलों की बढ़ती संख्या ने सार्वजनिक अस्पतालों पर दबाव बढ़ा दिया है, जबकि दिल्ली में मातृ मृत्यु दर में धीरे-धीरे वृद्धि देखी जा रही है। इन बड़े शहरी केंद्रों में भी समान समस्याएँ – जैसे कि फॉलो‑अप देखभाल का अभाव और रोगी‑सेवा अनुपात में असंतुलन – सामने आई हैं, जो राजस्थान की स्थिति को एक राष्ट्रीय चुनौती के रूप में प्रस्तुत करती हैं।
परिणाम और आगे का रास्ता
शोकग्रस्त परिवार अब केवल शोक नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व और सुधार की माँग कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि मृतकों के कारणों का पारदर्शी खुलासा हो, साथ ही भविष्य में ऐसी त्रासदियों को रोकने के लिए नीतियों में बदलाव आए। विशेषज्ञों का कहना है कि डॉक्टर‑नर्स अनुपात में सुधार, आपातकालीन रक्त बैंक की स्थापना, और मातृ स्वास्थ्य के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम अमल में लाना आवश्यक है।