मैसूर के 99 वर्षीय स्वतंत्रता सेनानी वाई सी रेवन्ना ने देश की आजादी के संघर्ष को याद करते हुए आज की पीढ़ी को राष्ट्र के कल्याण के लिए निरंतर सक्रिय रहने का आह्वान किया है।
मुख्य बिंदु
- वाई सी रेवन्ना 1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन' के दौरान मात्र 15 वर्ष के थे।
- ब्रिटिश पुलिस द्वारा उन्हें और उनके साथियों को घने जंगलों में छोड़ दिया गया था।
- वे महात्मा गांधी के विचारों से गहराई से प्रभावित थे और एक गांधीवादी रहे।
- उनका मानना है कि 'स्वराज' केवल शुरुआत थी, वास्तविक लक्ष्य 'रामराज्य' प्राप्त करना है।
मैसूर के जीवित अंतिम दो पंजीकृत स्वतंत्रता सेनानियों में से एक, वाई सी रेवन्ना, आज के युवाओं, विशेषकर 'जेन जी' (Gen Z) के लिए प्रेरणा का एक जीवित स्तंभ हैं। 1942 में, जब वे मात्र 15 वर्ष के थे, उन्होंने स्कूल की खिड़की से कूदकर 'भारत छोड़ो आंदोलन' में शामिल होने का साहसिक निर्णय लिया था।
इतिहास की गूँज: जंगलों में छोड़े गए मासूम
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ब्रिटिश शासन की क्रूरता का सामना करते हुए, रेवन्ना को और उनके साथियों को दंडित करने के लिए 'काकना कोटे' के घने जंगलों में अंधेरी रात में छोड़ दिया गया था। यह क्षेत्र आज नागामहोल टाइगर रिजर्व का हिस्सा है। रेवन्ना बताते हैं कि उस भयावह अनुभव के बावजूद, उनके मन में आजादी के प्रति जुनून कम नहीं हुआ।
"हमारे नेता बहुत प्रभावशाली थे, उन्होंने हमें आजादी के महत्व को महसूस कराया।"
बोजोकमीडिया विश्लेषण: क्यों मायने रखता है यह संघर्ष
BozokMedia विश्लेषण दर्शाता है कि रेवन्ना का जीवन केवल एक व्यक्तिगत कहानी नहीं है, बल्कि यह भारत के संक्रमणकालीन दौर का प्रतिबिंब है। उनके संघर्ष ने दिखाया कि कैसे एक युवा पीढ़ी ने बिना किसी डर के औपनिवेशिक शक्ति को चुनौती दी। आज के संदर्भ में, उनका संदेश सामाजिक और नागरिक कर्तव्यों के प्रति जागरूकता जगाने के लिए महत्वपूर्ण है।
स्वराज से रामराज्य तक का सफर
रेवन्ना का मानना है कि 1947 में मिली आजादी केवल एक पड़ाव था। वे कहते हैं, "स्वराज केवल भारतीय आंदोलनों का एक हिस्सा था। जब तक हम 'रामराज्य' प्राप्त नहीं कर लेते, युवाओं को संगठित और सक्रिय रहना चाहिए।"
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. वाई सी रेवन्ना कौन हैं?
वाई सी रेवन्ना मैसूर के एक जीवित स्वतंत्रता सेनानी हैं जिन्होंने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी।
2. ब्रिटिश पुलिस ने उन्हें कैसे सजा दी थी?
नाबालिग होने के कारण उन्हें जेल भेजने के बजाय घने जंगलों में छोड़ दिया जाता था ताकि वे रास्ता भटक जाएं।