भारत और ऑस्ट्रेलिया ने 12‑वर्षीय अंतराल के बाद नाभिकीय ऊर्जा, समुद्री सुरक्षा और महत्वपूर्ण खनिजों पर 18 प्रमुख संधियाँ हस्ताक्षर कीं। इस ऐतिहासिक कदम से दोनों देशों के बीच ऊर्जा, रक्षा और व्यापार संबंधों को नया आयाम मिला।

राष्ट्रपतियों के बीच हुई गहन वार्ताओं के बाद, भारत और ऑस्ट्रेलिया ने आज 18 महत्वपूर्ण संधियाँ पक्की कीं, जिनमें नाभिकीय ऊर्जा, समुद्री सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा और महत्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्र शामिल हैं। यह समझौता 12 साल पहले हस्ताक्षरित ऐतिहासिक नागरिक नाभिकीय सहयोग संधि के बाद पहला व्यावसायिक कदम है, जिससे ऑस्ट्रेलिया से भारत को यूरेनियम आपूर्ति संभव होगी।

नाभिकीय ऊर्जा का नया अध्याय

भारत का नाभिकीय पावर प्रोग्राम तेज़ी से बढ़ रहा है। अब ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम की आपूर्ति से भारत के स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों में नई गति मिलेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस पर जोर देते हुए कहा कि यह कदम न केवल ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करेगा बल्कि भारत को नाभिकीय ऊर्जा के क्षेत्र में वैश्विक मानकों के अनुरूप भी बनाएगा।

समुद्री सुरक्षा और रक्षा सहयोग

समुद्री सुरक्षा रोडमैप के अंतर्गत भारत के कोस्ट गार्ड और ऑस्ट्रेलिया के मरीटाइम बॉर्डर कमांड के बीच सहयोग को बढ़ाया गया है। दोनों पक्ष शिपबिल्डिंग, मरम्मत और रखरखाव में भी साझेदारी करेंगे। इस कदम से इंडो‑पैसिफिक क्षेत्र में समुद्री कानून प्रवर्तन और सीमा सुरक्षा को मजबूत करने की उम्मीद है।

महत्वपूर्ण खनिज और साइबर सुरक्षा

भारत और ऑस्ट्रेलिया ने एक नया ‘क्रिटिकल मिनरल्स कॉरिडोर’ और ‘साइबर, क्रिटिकल टेक्नोलॉजीज और सप्लाई चेन’ साझेदारी भी शुरू की। यह पहल दोनों देशों के बीच ऊर्जा संक्रमण और रणनीतिक सुरक्षा को सुदृढ़ करेगी। साथ ही, ऊर्जा सुरक्षा ढाँचे के अंतर्गत कोयला, डीजल, तरल ईंधन और प्राकृतिक गैस की स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी।

आर्थिक और निवेश पहल

दोनों पक्षों ने व्यापक आर्थिक सहयोग समझौते (CECA) और निवेश संरक्षण ढाँचे को तेज़ी से पूरा करने का निर्णय लिया। यह कदम ऑस्ट्रेलियाई निवेशकों को भारत के विविध बाजारों में प्रवेश के लिए प्रोत्साहित करेगा और दोनों अर्थव्यवस्थाओं के बीच व्यापार को बढ़ावा देगा।

इन सभी समझौतों के साथ, प्रधानमंत्री मोदी ने इंडो‑पैसिफिक को ‘एक मुक्त और स्थिर समुद्र’ के रूप में वर्णित किया, जहाँ लोकतंत्रों के बीच सहयोग और सामंजस्य आवश्यक है। इस रणनीतिक साझेदारी से चीन के बढ़ते सैन्य प्रभाव का मुकाबला करने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया।