अमेरिकी उपराष्ट्रपति JD Vance ने H-1B वीज़ा कार्यक्रम के दुरुपयोग पर सख़्त कार्रवाई की घोषणा की। श्रम विभाग ने कई कंपनियों को समन बनाकर जांच शुरू की, जिससे करदाता धन की सुरक्षा और विदेशी धोखेबाज़ों को रोका जा सके।

विस्कॉन्सिन के मिलवॉकी में एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में उपराष्ट्रपति JD Vance ने स्पष्ट किया कि अमेरिकी नौकरियों को केवल अमेरिकी कामगारों को ही देना चाहिए, न कि विदेशियों को जो वीज़ा प्रणाली का दुरुपयोग करते हैं। उन्होंने कहा कि वर्तमान में H-1B वीज़ा कार्यक्रम का उपयोग कुछ बड़ी कंपनियों और विदेशी ठगों द्वारा अमेरिकी श्रमिकों की वेतन को नीचे लाने के लिये किया जा रहा है।

H-1B वीज़ा कार्यक्रम का मूल उद्देश्य

H-1B वीज़ा 1990 के दशक में विज्ञान, प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य और अन्य विशेषीकृत क्षेत्रों में कुशल पेशेवरों को अमेरिका लाने के लिये बनाया गया था। इस कार्यक्रम के तहत नियोक्ताओं को श्रम विभाग को यह प्रमाणित करना पड़ता है कि विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करने से समान पदों पर काम करने वाले अमेरिकी कर्मचारियों के वेतन या कार्य स्थितियों पर नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा।

वर्तमान दुरुपयोग और जांच की दिशा

Vance ने बताया कि श्रम विभाग ने पहले ही दर्जनों समन जारी किए हैं और कई कंपनियों के विरुद्ध जांच शुरू कर दी है, जिनपर H-1B वीज़ा का दुरुपयोग करने का आरोप है। यह कदम ‘America First’ नीति के तहत करदाता के पैसे की रक्षा और रोजगार बाजार को संतुलित रखने की दिशा में उठाया गया है।

भारतीय पेशेवरों पर संभावित प्रभाव

भारत से आने वाले तकनीकी, इंजीनियरिंग, स्वास्थ्य और वित्तीय क्षेत्रों के कई पेशेवर H-1B वीज़ा के प्रमुख लाभार्थी हैं। इस कड़े कदम से भारतीय पेशेवरों के लिए वीज़ा प्रक्रिया में देरी, अधिक जाँच या संभावित अस्वीकृति का जोखिम बढ़ सकता है। साथ ही, भारत की आईटी कंपनियों को भी अपने अमेरिकी प्रोजेक्ट्स में कर्मचारियों की उपलब्धता के संदर्भ में रणनीतिक पुनर्मूल्यांकन करना पड़ सकता है।

भविष्य की संभावनाएँ और नीति‑परिवर्तन

संयुक्त राज्य कांग्रेस द्वारा वार्षिक 65,000 नए H-1B वीज़ा की सीमा निर्धारित है, जिसमें 20,000 उन्नत डिग्री धारकों के लिये आरक्षित हैं। यदि इस जांच को सख़्त किया गया तो इस सीमा में संशोधन या अतिरिक्त प्रतिबंध लग सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम केवल दुरुपयोग को रोकने के लिये नहीं, बल्कि अमेरिकी श्रमिकों के वेतन दबाव को कम करने के लिये भी है।

जैसे-जैसे यह नीति लागू होगी, अमेरिकी कंपनियों को वैध रूप से विदेशी विशेषज्ञों को नियुक्त करने के लिये अधिक पारदर्शी प्रक्रिया अपनानी पड़ेगी, जबकि भारतीय और अन्य विदेशी पेशेवरों को अपनी योग्यता और वैधता साबित करने के लिये अतिरिक्त दस्तावेज़ीकरण की जरूरत पड़ेगी।