तीन‑दिन की ऑस्ट्रेलिया यात्रा के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी न्यूज़ीलैंड की ओर रवाना हुए। दो‑दिन के दौरे में आर्थिक, व्यापार और ऊर्जा सहयोग को बढ़ाने के लिए प्रमुख वार्तालाप होंगे।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • ऑस्ट्रेलिया में तीन‑दिन की यात्रा समाप्त, नई द्विपक्षीय समझौतों पर हस्ताक्षर
  • न्यूज़ीलैंड में दो‑दिन का दौरा, व्यापार‑वाणिज्य एवं ऊर्जा सहयोग को सुदृढ़ करने पर फोकस
  • इंडो‑पैसिफिक में रक्षा एवं समुद्री सुरक्षा साझेदारी को गहरा करने का लक्ष्य

ऑस्ट्रेलिया के मेलबोर्न हवाई अड्डे से प्रस्थान करते ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीन‑देशीय यात्रा की अंतिम कड़ी के लिए न्यूज़ीलैंड का रुख किया। यह दौरा भारत‑ऑस्ट्रेलिया‑इंडोनेशिया के व्यापक रणनीतिक साझेदारी को सुदृढ़ करने के साथ-साथ न्यूज़ीलैंड के साथ द्विपक्षीय संबंधों को नई ऊँचाइयों पर ले जाने का उद्देश्य रखता है।

ऑस्ट्रेलिया में प्रमुख समझौते

ऑस्ट्रेलिया में तीन‑दिन के प्रवास में दो देशों ने सिविल न्यूक्लियर ऊर्जा, समुद्री सुरक्षा और महत्त्वपूर्ण खनिज क्षेत्रों में ऐतिहासिक समझौतों पर हस्ताक्षर किए। विशेष रूप से यूरेनियम निर्यात पर समझौता, जिसने दो‑वर्ष के वार्तालाप को समाप्त किया, भारत के अणु ऊर्जा परियोजनाओं के लिए नई आपूर्ति श्रृंखला खोलता है। इन समझौतों को विदेश मंत्रालय ने "स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप" की नई परिभाषा के रूप में वर्णित किया।

न्यूज़ीलैंड में दो‑दिन का एजेंडा

न्यूज़ीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन के साथ दो‑दिन के द्विपक्षीय वार्तालाप में आर्थिक, व्यापार और ऊर्जा सहयोग को तीव्र करने पर ज़ोर दिया जाएगा। लक्सन ने पहले ही घोषणा की है कि न्यूज़ीलैंड के 57 % निर्यात भारत को शुल्क‑मुक्त होंगे, जो दोनों देशों के बीच वस्तु-परिवहन को तेज़ करेगा। मोदी ने कहा कि यह यात्रा भारत‑लक्सन मार्च 2025 की भारत यात्रा की गति को आगे बढ़ाएगी।

इंडो‑पैसिफिक में रक्षा एवं समुद्री सुरक्षा

ऑस्ट्रेलिया में हुई बैठकों ने इंडो‑पैसिफिक क्षेत्र में रक्षा सहयोग को विशेष महत्व दिया। समुद्री क्षेत्र में संयुक्त अभ्यास, निगरानी और सायबर सुरक्षा के लिए नई प्रोटोकॉल पर सहमति बनी। यह पहल चीन के बढ़ते प्रभाव के जवाब में भारत की रणनीतिक स्थिति को सुदृढ़ करने के लक्ष्य को प्रतिबिंबित करती है।

भविष्य की संभावनाएँ

इन तीन देशों के बीच सहयोग का विस्तार न केवल द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ाएगा, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता, ऊर्जा सुरक्षा और तकनीकी नवाचार में भी नई संभावनाएँ खोलेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इस दौर की कूटनीति भारत को निरपेक्षता के साथ एक बहुपक्षीय मंच पर प्रमुख खिलाड़ी के रूप में स्थापित करेगी।