भारत ने चीन के प्रति अपने व्यापार‑निवेश नीति में बदलाव किए हैं, जिससे दोनों देशों के बीच आयात‑निर्यात संबंध गहरा हो रहा है। यह लेख इस रणनीतिक परिवर्तन के कारणों, संभावित लाभों और चुनौतियों का व्यापक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- भारत ने चीन के साथ व्यापारिक बाधाओं को धीरे‑धीरे कम किया है।
- द्विपक्षीय आयात‑निर्यात 2025‑26 में $131 बिलियन तक पहुंचा।
- FDI नीति में बदलाव से भारत में चीनी निवेश की संभावना बढ़ेगी।
पृष्ठभूमि और नीति बदलाव
2019 में भारत ने RCEP से बाहर रहने का निर्णय लिया था, जिससे चीन‑भारत व्यापार संबंधों में अनिश्चितता पैदा हुई। 2020 में प्रेस नोटिस 3 के माध्यम से सीमा‑पार निवेश पर सरकारी मंजूरी अनिवार्य कर दी गई, मुख्यतः चीन के बढ़ते प्रभाव को नियंत्रित करने के इरादे से। हालांकि, इन कदमों के बावजूद 2025‑26 में चीन से आयात $131 बिलियन तक पहुँच गया, जो भारत के गैर‑तेल वस्तु व्यापार घाटे का आधा हिस्सा बनता है।
वर्तमान आर्थिक परिदृश्य
चीन से प्रत्यक्ष विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) अब तक मात्र $2.5 बिलियन रहा है, लेकिन सरकार ने हाल ही में डिक्सन टेक्नोलॉजीज‑विवो मोबाइल के संयुक्त उद्यम को स्वीकृति दी है, जिससे इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस और स्मार्टफोन उत्पादन में स्थानीय भागीदारी बढ़ेगी। यह कदम भारत के ‘मेक‑इन‑इंडिया’ पहल के साथ सामंजस्य स्थापित करता है, जबकि चीन‑आधारित आपूर्ति श्रृंखला से निर्भरता घटाने की दिशा में भी संकेत देता है।
‘China+1’ रणनीति में भारत की भूमिका
वैश्विक कंपनियाँ चीन से उत्पादन हटाकर ‘China+1’ मॉडल अपनाने की कोशिश कर रही हैं, पर भारत ने इस अवसर का पूरा लाभ नहीं उठाया है; वियतनाम जैसे पड़ोसी देशों को अधिक निवेश मिला है। आर्थिक सर्वे 2023‑24 ने दो विकल्प प्रस्तुत किए: आपूर्ति श्रृंखला में गहरा एकीकरण या चीन से अधिक FDI आकर्षित करना। सरकार ने बाद वाले विकल्प को प्राथमिकता दी, और मार्च 2026 में सीमा‑पार FDI नीति में संशोधन किया, जिससे 85 वस्तुओं पर कस्टम शुल्क माफी भी मिली।
वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में चीन का स्थान
UNCTAD की विश्व निवेश रिपोर्ट के अनुसार, चीन का आउटवर्ड निवेश अब अधिक लक्षित है—ग्रीनफ़ील्ड प्रोजेक्ट, ऊर्जा, बुनियादी ढांचा और कच्चे माल पर केंद्रित, विशेषकर विकासशील देशों में। इसलिए भारत के लिए रणनीतिक संतुलन बनाना अनिवार्य है: सुरक्षा चिंताओं को देखते हुए आर्थिक अवसरों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
आगे का रास्ता और नीतिगत सिफ़ारिशें
देशी विनिर्माण इको‑सिस्टम को गहरा करने के लिए मूल्यवर्धन, तकनीकी उन्नति और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के साथ निकट सहयोग आवश्यक है। नीति निर्माताओं को सावधानीपूर्वक, चरणबद्ध दृष्टिकोण अपनाते हुए, निवेशकों को स्पष्ट नियामक ढांचा प्रदान करना चाहिए, जिससे दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित हो सके।