एक भारतीय पेशेवर ने H‑1B वीज़ा स्टैंपिंग यात्रा के बाद स्वयं को अमेरिका छोड़कर भारत लौटाने का फैसला किया। परिवार के करीब रहने, नेटवर्किंग में आसानी और वीज़ा अनिश्चितता से मुक्ति को सकारात्मक बताया, पर बुनियादी ढाँचे, यातायात और प्रदूषण जैसी समस्याएँ सामने आईं।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- परिवार के निकटता और आसान नेटवर्किंग ने वापसी को प्रेरित किया
- भारतीय बुनियादी ढाँचा, ट्रैफ़िक और प्रदूषण दैनिक चुनौतियाँ बनाते हैं
- भविष्य में भारत को आकर्षक बनाना आवश्यक है, न कि केवल कर्तव्य का बोझ
एक भारतीय आईटी प्रोफ़ेशनल ने हाल ही में H‑1B वीज़ा स्टैंपिंग यात्रा के बाद अमेरिका छोड़कर भारत लौटने का निर्णय साझा किया। यह बयान Zoho के संस्थापक श्रीधर वेंबु के खुले पत्र के जवाब में आया, जहाँ उन्होंने विदेश में रहने वाले भारतीयों से भारत लौटने पर विचार करने को कहा था।
वापसी का कारण
वापसी का मूल कारण छह साल पहले एक स्टैंपिंग यात्रा के दौरान उसके चाचा के साथ हुई बातचीत थी। चाचा ने कहा, “अगर तुम्हें अपना कुछ बनाना है तो क्यों न भारत में ही शुरू करो?” इस बात ने उसे अपने करियर को भारतीय धरती पर स्थापित करने की दिशा में सोचने पर मजबूर किया। छह महीने बाद वह भारत वापस आया।
पॉज़िटिव पहलू
वापसी के बाद उसने सबसे बड़ी सकारात्मक बात के रूप में परिवार के करीब रहने को उजागर किया। माता‑पिता के साथ अधिक समय बिताना, त्यौहारों में रिश्तेदारों के साथ मिलना और सामाजिक जीवन में सुधार उसे संतुष्टि देता है। पेशेवर रूप से भी उसने बताया कि भारत में नेटवर्क बनाना आसान है—एक फोन कॉल में कई दरवाज़े खुल जाते हैं, जबकि अमेरिका में वही प्रक्रिया महीनों तक चलती है। वीज़ा या ग्रीन कार्ड की अनिश्चितता से मुक्त होना भी एक बड़ा आराम है।
सामना की गई चुनौतियाँ
हालाँकि, भारत लौटने के बाद बुनियादी ढाँचा, ट्रैफ़िक, व्यावसायिक प्रक्रियाएँ और प्रदूषण जैसी समस्याएँ दैनिक जीवन का हिस्सा बन गईं। वह बताता है कि सड़कों पर निरंतर खनन, पानी, केबल और खराब ड्रेनेज की स्थिति “कम से कम नौ महीने” तक बनी रहती है। व्यवसाय चलाते समय अनुमतियों में देरी, बार‑बार निरीक्षण और जटिल प्रक्रियाएँ बाधा बनती हैं।
यातायात भी एक बड़ी समस्या है; “बीस मिनट की यात्रा को साठ मिनट लगते हैं” और “हर कमरे में एयर प्यूरीफायर की आवश्यकता होती है”। आवास की कीमतें, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सार्वजनिक स्थानों की कमी भी प्रमुख चिंताएँ हैं।
भविष्य की दिशा
इन सभी कठिनाइयों के बावजूद, वह अपने निर्णय पर पछतावा नहीं करता। वह मानता है कि परिवार, अवसर और भारत को योगदान देने की इच्छा ने समीकरण को उसके पक्ष में किया। वह विदेश में रहने वालों को सलाह देता है कि वे लौटने से पहले अपने ट्रेड‑ऑफ़ को सावधानी से आंकें और यह सुनिश्चित करें कि भारत “आकर्षक” बन सके, न कि केवल “बोझ”।