प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडो‑पैसिफिक यात्रा ने आर्थिक, रणनीतिक और सुरक्षा सहयोग को एक साथ लाने का लक्ष्य रखा। लेकिन इन समझौतों की सफलता दिल्ली के घरेलू कार्यान्वयन पर निर्भर करेगी।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • मोदी की इंडो‑पैसिफिक यात्रा का मुख्य उद्देश्य रणनीतिक गहराई बनाना है।
  • द्विपक्षीय समझौते घरेलू कार्यान्वयन पर निर्भर करेंगे।
  • ASEAN‑भारत व्यापार अंतर को घटाने के लिए ठोस कदम आवश्यक हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड की छह‑दिन की यात्रा पूरी की, जो अमेरिकी‑चीन तनाव के बीच भारत की स्वतंत्र विदेश नीति को उजागर करती है। इस दौरे का उद्देश्य “लुक ईस्ट” और “ऐक्ट ईस्ट” को आगे बढ़ाते हुए आर्थिक, रणनीतिक और सुरक्षा सहयोग को एकीकृत करना था।

पृष्ठभूमि और ऐतिहासिक संदर्भ

तीन दशक से भारत ने “लुक ईस्ट” नीति के तहत दक्षिण‑पूर्व एशिया के साथ संबंधों को गहरा किया, फिर “ऐक्ट ईस्ट” के साथ रणनीतिक जुड़ाव को तेज किया। हालांकि, आंकड़े दर्शाते हैं कि इस प्रयास में अभी भी बड़ा अंतर है। 2000 में भारत‑ASEAN का व्यापार लगभग $7 बिलियन था, जो 2025 में $125 बिलियन तक बढ़ा, जबकि चीन‑ASEAN का व्यापार उसी अवधि में $40 बिलियन से लगभग $1 ट्रिलियन तक पहुँच गया। समान अंतर कनेक्टिविटी, प्रौद्योगिकी साझेदारी और रक्षा सहयोग में भी स्पष्ट है।

तीन‑देशीय दौरे के प्रमुख उपलब्धियां

इंडोनेशिया में, स्बांग पोर्ट के विकास को तेज करने का निर्णय समुद्री लॉजिस्टिक्स और नेवल सहयोग को सुदृढ़ करेगा। ब्रह्मोस मिसाइल की बिक्री के माध्यम से भारत का रक्षा निर्यातक के रूप में संभावित प्रभाव भी स्पष्ट हो रहा है। ऑस्ट्रेलिया में व्यापक मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की वार्ता और यूरेनियम निर्यात के प्रशासनिक प्रबंध भारत के परमाणु ऊर्जा विस्तार में महत्वपूर्ण कदम हैं, जबकि ऑस्ट्रेलिया के क्रिटिकल मिनरल्स भारत की दीर्घकालिक औद्योगिक वृद्धि के लिए आधार बन सकते हैं। न्यूज़ीलैंड में हाल ही में समाप्त FTA और समुद्री सहयोग भारत को दक्षिण‑प्रशांत में चीन की बढ़ती रणनीतिक उपस्थिति के मुकाबले एक वैकल्पिक साझेदार बनाता है।

विफलता के मूल कारण

इन उपलब्धियों के बावजूद, भारत की सबसे बड़ी बाधा कूटनीतिक पहल नहीं, बल्कि उनके बाद की कार्यान्वयन क्षमता है। स्बांग पोर्ट और ऑस्ट्रेलिया के यूरेनियम पर चर्चा एक दशक से अधिक समय से चल रही है, लेकिन ठोस परिणाम अभी नहीं दिखे। विदेश में होने वाले बैनर‑बोल्ड प्रदर्शन की तुलना में घरेलू नीति, नियमन और बुनियादी ढाँचे की तैयारियों को प्राथमिकता देना आवश्यक है, नहीं तो समझौते केवल कागज़ पर ही रहेंगे।

आगे का रास्ता

इंडो‑पैसिफिक रणनीति को सफल बनाने के लिए भारत को अपने घरेलू उद्योग को निरंतर सुधारना होगा, आपूर्ति श्रृंखला की लचीलापन बढ़ानी होगी और तकनीकी साझेदारियों को तेज करना होगा। तभी वह ASEAN‑भारत व्यापार अंतर को घटा कर, क्षेत्रीय सुरक्षा में भरोसेमंद साझेदार के रूप में स्थापित हो सकेगा।