संयुक्त राज्य अमेरिका ने इराक में 23 साल की सैन्य मौजूदगी को 30 सितंबर तक समाप्त करने की घोषणा की है। यह कदम 2003 के इराक आक्रमण से शुरू हुई अमेरिकी सैन्य भूमिका का अंत दर्शाता है, जबकि अमेरिकी कंपनियां देश में व्यापार जारी रखेंगी।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- अमेरिकी सेना 30 सितंबर तक इराक से पूरी तरह हट जाएगी।
- यह निकास 2003 के आक्रमण से शुरू हुई 23‑साल की सैन्य मौजूदगी को समाप्त करता है।
- अमेरिकी कंपनियां इराक में व्यापारिक संचालन जारी रखेंगी।
वॉशिंगटन – अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इराक के प्रधान मंत्री अली अल-ज़ैदी के साथ व्हाइट हाउस में आयोजित ब्रीफ़िंग में घोषणा की कि संयुक्त राज्य के सैनिक 30 सितंबर तक इराक से पूरी तरह हट जाएंगे। यह निर्णय 2003 में सड़ाम हुसैन को हटाने के लिए शुरू हुई अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप के बाद से चल रही 23‑साल की मौजूदगी को समाप्त करता है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
2003 में शुरू हुई "शॉक एंड ऑव" अभियान ने इराक के कई शहरों को बर्बाद किया और अमेरिकी सेना को बगदाद तक पहुंचाया। प्रारंभिक लक्ष्य सड़ाम हुसैन के कथित हथियारों को खत्म करना था, लेकिन वे कभी नहीं मिले। 2007 में इराक में अमेरिकी बल की संख्या 1,70,000 तक पहुंच गई, जिससे बड़े पैमाने पर काउंटर‑इंसर्जेंसी ऑपरेशन चलाए गए। 2011 में ऑबामा सरकार के समझौते के बाद अधिकांश कॉम्बैट टैप को इराक से वापस ले लिया गया, केवल सुरक्षा सहायता और एम्बेसी सुरक्षा के लिए छोटे दल बचे।
आतंकवाद के दौर में पुनः वापसी
2014 में इस्लामिक स्टेट (आईएस) के तेज़ विस्तार ने अमेरिकी और सहयोगी बलों को इराक सरकार के अनुरोध पर फिर से बुलाया। उनका मुख्य कार्य आईएस को हटाने, स्थानीय सुरक्षा बलों को प्रशिक्षित करने और बुनियादी ढांचे को पुनर्निर्मित करने का था। 2021 में आईएस ने अपने अधिकांश क्षेत्र खो दिए, जिससे संयुक्त राज्य ने अपने मिशन को घटाते हुए 2,500 सैनिकों को प्रशिक्षण और संयुक्त ऑपरेशनों के लिए रखा।
2024 का समझौता और वर्तमान निकासी
2024 में इराक के साथ एक नया समझौता हुआ, जिसमें अमेरिकी सेना को आईएस के खिलाफ लड़ाई समाप्त करने और प्रशिक्षण पर ध्यान केंद्रित करने का प्रावधान था। इस समझौते के बाद कई सैनिकों को पहले ही इराक से वापस बुला लिया गया। ट्रम्प की घोषणा इस समझौते को पूर्ण रूप से लागू करने की दिशा में अंतिम कदम है।
भविष्य के प्रभाव
सैन्य निकास के बाद इराक की सुरक्षा व्यवस्था पर बड़ा दबाव पड़ेगा। जबकि अमेरिकी कंपनियां तेल और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में निवेश जारी रखेंगी, स्थानीय सेना को आईएस जैसे उभरते खतरों का सामना करने के लिए अधिक आत्मनिर्भर बनना पड़ेगा। इस कदम से यू‑एस संबंधों में आर्थिक सहयोग की नई दिशा खुल सकती है, परन्तु क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में परिवर्तन भी संभावित है।