केरल उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि चिकित्सा पेशेवर भी कानून से ऊपर नहीं हैं। कोर्ट ने 2010 में एक 10 वर्षीय बच्ची की मौत से जुड़े मेडिकल लापरवाही के मामले में डॉक्टरों को राहत देने से इनकार कर दिया है।
मुख्य बातें
- केरल उच्च न्यायालय ने कहा कि डॉक्टर कानून से ऊपर नहीं हैं।
- 2010 की एक बच्ची की मौत के मामले में डॉक्टरों के खिलाफ आपराधिक मामला जारी रहेगा।
- कोर्ट ने विशेषज्ञ पैनल की रिपोर्ट को बरकरार रखा जिसमें लापरवाही का संकेत दिया गया है।
- 16 साल बाद भी ट्रायल शुरू न होने पर कोर्ट ने चिंता जताई है।
केरल उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक टिप्पणी करते हुए कहा है कि 'हिप्पोक्रेटिक ओथ' (Hippocratic Oath) लेने वाले डॉक्टर भी देश के कानून से ऊपर नहीं हैं। कोर्ट ने 2010 में एक 10 वर्षीय बच्ची की दर्दनाक मौत से जुड़े मामले में दो डॉक्टरों द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया है, जिसमें उन पर गंभीर चिकित्सा लापरवाही का आरोप है।
न्यायमूर्ति ए के जयशंकर नंबियार और न्यायमूर्ति प्रीता ए के की पीठ ने स्पष्ट किया कि चिकित्सा पेशेवरों को अभियोजन से 'उन्मुक्ति' (Immunity) का दावा करने का कोई अधिकार नहीं है। अदालत ने विशेषज्ञ पैनल की उस रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया है जिसमें डॉक्टरों की घोर लापरवाही की बात कही गई है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह फैसला चिकित्सा जगत में जवाबदेही तय करने के लिए एक मील का पत्थर साबित होगा। अक्सर चिकित्सा पेशेवरों द्वारा अपनी विशेषज्ञता का हवाला देकर कानूनी कार्रवाई से बचने की कोशिश की जाती है, लेकिन इस आदेश ने स्पष्ट कर दिया है कि पेशेवर नैतिकता और कानून दोनों का पालन करना अनिवार्य है।
"कानून के शासन का एक मौलिक पहलू यह है कि कानून के सामने हर कोई समान है, चाहे वह कोई भी पेशा अपनाता हो।"
यह मामला अगस्त 2010 का है, जब एक बच्ची को पेट दर्द और उल्टी की शिकायत के साथ क्रिश्चियन मिशन अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उपचार के दौरान उसे कुछ दवाएं दी गईं, जिसके बाद उसकी स्थिति बिगड़ गई और अंततः उसकी मृत्यु हो गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण 'चोकिंग' (दम घुटना) बताया गया था।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
यह मामला पिछले 16 वर्षों से न्याय के लिए संघर्ष कर रहा है। शुरुआत में राज्य स्तरीय विशेषज्ञ निकाय ने डॉक्टरों को क्लीन चिट दी थी, लेकिन उच्च न्यायालय ने उस रिपोर्ट को रद्द कर दिया था। दोबारा जांच के बाद, नए पैनल ने डॉक्टरों को दोषी पाया, जिसे अब अदालत ने सही माना है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. क्या कोर्ट ने डॉक्टरों को दोषी करार दे दिया है?
नहीं, कोर्ट ने केवल विशेषज्ञ पैनल की रिपोर्ट को स्वीकार किया है। दोषसिद्धि का निर्णय आपराधिक मुकदमे (Trial) के दौरान साक्ष्यों के आधार पर होगा।
2. डॉक्टरों की मुख्य दलील क्या थी?
डॉक्टरों का तर्क था कि पैनल में बाल रोग विशेषज्ञों (Paediatric experts) की कमी थी, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया।