दिल्ली पुलिस ने आयकर विभाग के सिविक सेंटर में चल रहे एक झूठे भर्ती जाल को उजागर कर तीन लोगों को गिरफ्तार किया। इस घोटाले में कम से कम सात उम्मीदवारों से लगभग 10 लाख रुपये की ठगी की गई।
दिल्ली पुलिस ने आयकर विभाग के सिविक सेंटर परिसर में आयोजित एक झूठी भर्ती प्रक्रिया को रोकते हुए तीन लोगों को हिरासत में ले लिया। आरोप है कि इस गिरोह ने सरकारी नौकरी के इच्छुक युवाओं को सामाजिक मीडिया पर विज्ञापनों के माध्यम से आकर्षित कर, विभाग के भीतर ही नकली साक्षात्कार और ओरिएंटेशन सत्र करवाए।
घोटाले की रूपरेखा
जांच के अनुसार, इस नेटवर्क ने प्रत्येक पीड़ित से 1 लाख से 2 लाख रुपये तक ले लिए, जिससे कुल मिलाकर लगभग 10 लाख रुपये की धनराशि चोरी हुई। सबसे पहला शिकायतकर्ता, अजमेरी गेट का निवासी, ने 2 लाख रुपये का नुकसान बताया, जब उसे आयकर विभाग में मल्टी‑टास्किंग स्टाफ की नौकरी का झूठा वादा किया गया।
कैसे किया गया धोखा
गिरोह के सदस्य स्वयं को विभाग के अधिकारी बताकर, पीड़ितों को आधिकारिक दस्तावेज़, फॉर्म और सेवा पुस्तिकाएँ दिखाते थे। वे न केवल नकली साक्षात्कार आयोजित करते थे, बल्कि विभाग के पार्किंग एरिया में ही अभ्यर्थियों को ‘ऑरिएंटेशन’ सत्र भी करवाते थे, जिससे प्रक्रिया वास्तविक लगती। कई मामलों में, पीड़ितों की शैक्षिक दस्तावेज़ भी पहले ही जमा कर ली गई थीं।
गिरफ़्तारी और आगे की जाँच
हौज़ काज़ी पुलिस स्टेशन में 18 मई को दर्ज की गई एफआईआर के बाद, तकनीकी निगरानी, बैंक लेन‑देनों और फ़ोन रिकॉर्ड की जाँच से तीन मुख्य आरोपी पकड़े गए: रोहित चौहान (उपनाम दीपक तिवारी), चिराग अग्रवाल (उपनाम नवीन प्रकाश) और तरुण गोस्वामी (उपनाम गिरिराज)। एक अन्य संदेहित, पवन दत्त शर्मा, को भी पूछताछ के दौरान हिरासत में ले लिया गया।
प्रभाव और भविष्य की दिशा
यह केस न केवल नौकरी खोजने वाले युवा वर्ग को आर्थिक रूप से प्रभावित करता है, बल्कि सरकारी संस्थानों की सुरक्षा और सार्वजनिक विश्वास को भी धूमिल करता है। पुलिस ने अब तक चार मोबाइल फ़ोन, पीड़ितों के पहचान दस्तावेज़ और नकली सत्यापन फॉर्म जब्त कर लिए हैं, और मुख्य साजिशकर्ता के पीछे का बड़ा नेटवर्क उजागर करने के लिए जांच जारी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया पर बढ़ते विज्ञापनों और सरकारी कार्यालयों की अनधिकृत पहुंच को रोकने के लिए कड़ी निगरानी आवश्यक है, ताकि भविष्य में ऐसे धोखाधड़ी स्कीम को रोका जा सके।