हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने कारोबारी निशांत शर्मा और पूर्व डीजीपी संजय कुंडू के बीच विवाद से जुड़ी स्वत: संज्ञान कार्यवाही को समाप्त कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अब दोनों पक्ष पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट के खिलाफ संबंधित मजिस्ट्रेट के पास अपनी आपत्तियां दर्ज करा सकते हैं।
हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने पालमपुर के प्रमुख होटल कारोबारी निशांत शर्मा के 2023 के प्रतिवेदन पर शुरू की गई स्वत: संज्ञान कार्यवाही को आधिकारिक तौर पर समाप्त कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायमूर्ति बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने फैसला सुनाया कि इस मामले में अब उच्च न्यायालय द्वारा किसी और आदेश की आवश्यकता नहीं है, और इस कानूनी विवाद का भविष्य अब संबंधित क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट के हाथों में है। अदालत ने दोनों पक्षों को कानून के तहत उपलब्ध विकल्पों का उपयोग करने की पूरी स्वतंत्रता दी है।
विवाद की पृष्ठभूमि और क्रॉस-एफआईआर
इस हाई-प्रोफाइल विवाद ने हिमाचल प्रदेश के प्रशासनिक और पुलिस हलकों में भारी हलचल मचाई थी। कारोबारी निशांत शर्मा ने तत्कालीन पुलिस महानिदेशक (DGP) संजय कुंडू पर डराने-धमकाने का आरोप लगाया था, जिसके बाद दोनों पक्षों की ओर से क्रॉस-एफआईआर दर्ज की गई थीं। उच्च न्यायालय ने अब दोनों पक्षों को यह स्वतंत्रता दी है कि वे जांच एजेंसियों द्वारा दायर की गई रद्दीकरण (कैंसिलेशन) रिपोर्ट के खिलाफ सक्षम मजिस्ट्रेट के समक्ष अपनी आपत्तियां दर्ज करा सकते हैं और कानूनी लड़ाई को आगे बढ़ा सकते हैं।
जांच एजेंसियों की रिपोर्ट और कोर्ट का रुख
यह कानूनी गाथा अक्टूबर 2023 में शुरू हुई थी, जब निशांत शर्मा ने उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को एक ईमेल भेजकर अपनी जान को खतरा बताया था और तत्कालीन डीजीपी पर गंभीर आरोप लगाए थे। इसके जवाब में, तत्कालीन डीजीपी संजय कुंडू ने भी शर्मा के खिलाफ मानहानि और जालसाजी का मामला दर्ज कराया था। समय के साथ, पुलिस जांच एजेंसियों ने दोनों ही मामलों में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी, जिसमें कहा गया कि यह पूरा विवाद मुख्य रूप से व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता और आपसी मतभेदों का परिणाम था, न कि कोई सुनियोजित आपराधिक साजिश।
कानूनी प्रक्रिया और मजिस्ट्रेट का अधिकार क्षेत्र
उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि जांच एजेंसियों ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर एक तार्किक निष्कर्ष निकाला है। अदालत ने पूर्व डीजीपी द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर का जिक्र करते हुए कहा कि मानहानि जैसे मामलों में पुलिस जांच के बजाय सीधे मजिस्ट्रेट के समक्ष निजी शिकायत दर्ज कराई जानी चाहिए। खंडपीठ ने माना कि जांच निष्पक्ष तरीके से की गई है और इसमें किसी भी प्रकार की दुर्भावना नहीं पाई गई है, जिसके चलते इस अदालत-स्तरीय कार्यवाही को जारी रखने का कोई औचित्य नहीं रह जाता। अब यह पूरी तरह से मजिस्ट्रेट पर निर्भर करता है कि वह इन रिपोर्ट्स को स्वीकार करते हैं या आगे की जांच का आदेश देते हैं।
इस फैसले का दूरगामी महत्व यह है कि उच्च न्यायालय ने असाधारण न्यायिक हस्तक्षेप को समाप्त कर मामले को सामान्य कानूनी प्रक्रिया के तहत निचले न्यायालय में भेज दिया है। यह आदेश कानून के शासन को मजबूत करता है, जहां चाहे राज्य का सबसे बड़ा पुलिस अधिकारी हो या कोई रसूखदार व्यवसायी, सभी को स्थापित न्यायिक पदानुक्रम और मजिस्ट्रेट कोर्ट की प्रक्रिया का पालन करना होगा।