बीजेपी के राज्य महासचिव वि. सुनील कुमार ने कांग्रेस‑शासित कर्नाटक सरकार को जाति सर्वेक्षण (सामाजिक‑शैक्षणिक सर्वे) की रिपोर्ट को विधानसभा में तालिका में लाने और अपनी स्थिति स्पष्ट करने का आव्हान किया। उन्होंने रिपोर्ट के खर्च और सामाजिक न्याय पर संभावित प्रभाव को उजागर किया।
कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में बुधवार (8 जुलाई) आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के राज्य महासचिव एवं विधायक वि. सुनील कुमार ने कांग्रेस सरकार को कर्नाटक सामाजिक‑शैक्षणिक सर्वे, जिसे आमतौर पर ‘जाति सर्वे’ कहा जाता है, की रिपोर्ट पर अपना आधिकारिक रुख प्रकट करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि यह रिपोर्ट, जिसमें करदाता की 450 करोड़ रुपये से अधिक की राशि खर्च हुई है, को आगामी मानसून सत्र में विधायी चर्चा के लिए तालिका में रखा जाना चाहिए।
रिपोर्ट के खर्च और पारदर्शिता की मांग
सुनील कुमार ने कहा, “हम जानना चाहते हैं कि इस रिपोर्ट में कौन‑सी जानकारी है, क्योंकि यह करदाताओं की बड़ी रकम से तैयार की गई है। हमें इस पर बहस करने के लिए तैयार हैं।” उन्होंने यह भी बताया कि कांग्रेस सरकार ने इस सर्वेक्षण को लेकर दोहरे मानदंड अपनाए हैं, जहाँ पहले मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने ओबीसी‑सम्बंधित सामाजिक न्याय की बात की थी, परन्तु राज्य विधायिका में गवर्नर के संबोधन में बैकवर्ड क्लासेज़ कमीशन का उल्लेख नहीं किया गया।
बजट निर्माण में डेटा की कमी पर सवाल
केंद्रीय और राज्य स्तर पर सामाजिक‑आर्थिक डेटा के अभाव में प्रभावी बजट बनाना कठिन हो जाता है। सुनील कुमार ने संकेत दिया कि “बिना सटीक डेटा के, सामाजिक‑आर्थिक एवं शैक्षणिक स्थिति को समझे, कोई भी योजना या कार्यक्रम प्रभावी नहीं हो सकता।” उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कांग्रेस सरकार ने पिछले समय में समान रिपोर्ट को शेल्व कर दिया था, और वर्तमान में मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार भी इसे ‘डम्प’ करने की सम्भावना है।
राजनीतिक प्रभाव और भविष्य की दिशा
जाति सर्वेक्षण कर्नाटक के सामाजिक‑राजनीतिक परिदृश्य में एक संवेदनशील मुद्दा बन चुका है। ओबीसी, एपीसी और अन्य पिछड़ी वर्गों की जनसंख्या, शिक्षा और आय के आंकड़े नीति‑निर्माताओं के लिए महत्वपूर्ण संकेतक हैं। रिपोर्ट के प्रकाशन से आरक्षण, आर्थिक सहायता, और विकास योजनाओं में पुनःसंतुलन की संभावना है, जिससे आगामी चुनावी रणनीतियों पर गहरा असर पड़ेगा। विपक्षी दल इस रिपोर्ट को सरकार की जवाबदेही सिद्ध करने का उपकरण मान रहा है, जबकि शासक दल इसे संभावित सामाजिक अशांति के रूप में देख रहा है।
आगे के कदम
बीजेपी ने सरकार को आग्रह किया कि वह रिपोर्ट को विधायी सत्र में टेबल करे और सभी पक्षों को चर्चा के लिए मंच प्रदान करे। यदि सरकार इस मांग को स्वीकार करती है, तो कर्नाटक की सामाजिक‑आर्थिक नीति में पारदर्शिता और डेटा‑आधारित निर्णय‑लेने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है। अन्यथा, रिपोर्ट को अनदेखा करने से सार्वजनिक भरोसा और राजनीतिक स्थिरता दोनों को नुकसान पहुंच सकता है।