तीन पूर्व तृणमूल कांग्रेस नेता भाजपा में शामिल हुए और तुरंत आगामी राजसभा बायपोल के उम्मीदवार घोषित किए गए। यह कदम पश्चिम बंगाल में बीजेपी की स्थिति को मजबूत करने और टीएमसी के आंतरिक संकट का लाभ उठाने के लिए उठाया गया है।
नई दिल्ली: सुष्मिता देव, सुखेंदु शेखर रे और प्रकाश चिक बराइक ने आज सुबह कोलकाता के सॉल्ट लेक कार्यालय में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में प्रवेश किया। उनका स्वागत पश्चिम बंगाल भाजपा अध्यक्ष समीक भट्टाचार्य और अन्य वरिष्ठ नेताओं ने किया। प्रवेश के कुछ ही घंटों बाद उन्हें आगामी राजसभा बायपोल के उम्मीदवार घोषित कर लिया गया।
पार्टी बदलने की पृष्ठभूमि
इन तीनों राजनेताओं ने पिछले महीने ही तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) से इस्तीफा देकर राजसभा का पद त्याग दिया था। यह कदम मांता बनर्जी के नेतृत्व वाली पार्टी में बढ़ती आंतरिक बगावत और असंतोष के कारण आया। बायपोल के लिए खाली हुए सीटें उनके ही इस्तीफे के बाद शून्य रह गई थीं, जिससे बीजेपी को रणनीतिक लाभ मिला।
भाजपा की रणनीति
भाजपा ने कहा कि ये अनुभवी पूर्व सांसद पश्चिम बंगाल में पार्टी की उपस्थिति को सुदृढ़ करेंगे। राज्य में हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में टीएमसी की भारी हार के बाद, बीजेपी को उम्मीद है कि ये राजनेता अपने क्षेत्रीय संपर्कों और पारित अनुभव से नया मतदाताओं का आधार तैयार करेंगे।
टीएमसी में आंतरिक उथल‑पुथल
टीएमसी के भीतर बड़े पैमाने पर विद्रोह शुरू हो चुका है, जिसमें कई विधायक और सांसद अलग‑अलग गुटों में बंट रहे हैं। निर्यातित विधायक रिताब्रता बैनर्जी के नेतृत्व में एक बड़ा समूह कांग्रेस से अलग हो गया, जबकि कई सांसदों ने विरोधी गुट से मिलकर बैठकों में भाग लिया। यह स्थिति पार्टी के भीतर भरोसे को कमजोर कर रही है और भविष्य में और अधिक क्षरण का संकेत देती है।
नेताओं के व्यक्तिगत कारण
सुष्मिता देव ने कहा कि उन्होंने टीएमसी छोड़ने का फैसला “राजनीतिक और व्यक्तिगत दोनों कारणों” से किया है, और दो नावों पर एक साथ नहीं रह सकतीं। सुखेंदु शेखर रे ने टीएमसी की चुनावी हार को कई वर्षों की खराब शासन की वजह बताया, जबकि प्रकाश चिक बराइक ने जल्दी ही इस्तीफा देकर पार्टी में बढ़ते विरोध को स्पष्ट कर दिया।
ममता बनर्जी की प्रतिक्रिया
ममता बनर्जी ने विद्रोही गुट को “धोखेबाज” कहकर निंदा की और भाजपा में आकर्षित होने वाले नेताओं को दो नावों पर नहीं चलने की चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि पार्टी को अपने आंतरिक मुद्दों को सुलझाने के लिए समय नहीं है, बल्कि उन्हें “बारबरी” को दूर करना चाहिए।
इस राजनीतिक बदलाव के बाद, भारतीय राजनीति में पश्चिम बंगाल की शक्ति संरचना में नई गतिशीलता उभर रही है, जहाँ बीजेपी को इस अवसर का पूर्ण लाभ उठाने की उम्मीद है।